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संस्कृत वर्णमाला एवं सन्धि MCQ - उत्तर सहित अभ्यास प्रश्न

RAS/RPSC तैयारी के लिए संस्कृत वर्णमाला एवं सन्धि के 9 प्रश्न हल करें।

अभ्यास प्रश्न

प्र.1कौन-सा युग्म सही ढंग से बनाया गया है और उसका नाम भी सही दिया गया है?

A देव + इन्द्र = देविन्द्र (दीर्घ)
B देव + इन्द्र = देवेन्द्र (गुण)
C देव + इन्द्र = देवैन्द्र (वृद्धि)
D देव + इन्द्र = देव्यिन्द्र (यण्)
व्याख्या

सही उत्तर देवेन्द्र–गुण है। देव + इन्द्र में संधि-स्थान पर अ के सामने इ आता है, और गुण-संधि का नियम है अ/आ + इ/ई → ए, इसलिए रूप देवेन्द्र बनेगा और नियम गुण होगा। देविन्द्र–दीर्घ वाला विकल्प गलत रूप देता है और नियम का नाम भी गलत बताता है, क्योंकि दीर्घ के लिए दो समान सरल स्वर चाहिए, अ + इ नहीं। देवैन्द्र–वृद्धि वाला विकल्प गलत है क्योंकि वृद्धि के लिए आगे ए/ऐ/ओ/औ चाहिए, इ नहीं। देव्यिन्द्र–यण् वाला विकल्प भी गलत है क्योंकि यण् के लिए पहला स्वर इ/उ/ऋ होना चाहिए, पर यहाँ अ है। केवल देवेन्द्र–गुण युग्म सही रूप को सही नियम-नाम से जोड़ता है, जिसे अशोक को चिह्नित करने से पहले जाँचना है।

प्र.2कथन: (i) सु + आगत = स्वागत यण्-संधि है। (ii) ने + अन = नयन अयादि-संधि है। कौन-सा/से सही है/हैं?

A (i) और (ii) दोनों सही हैं
B केवल (i) सही है
C केवल (ii) सही है
D न तो (i), न ही (ii) सही है
व्याख्या

सही उत्तर यह है कि दोनों कथन सही हैं। कथन 1 में सु + आगत में स्वर उ असमान स्वर आ से मिलता है। यण्-संधि में असमान स्वर से पहले इ/ई से य्, उ/ऊ से व् और ऋ से र् बनता है, इसलिए उ से व् होकर स्वागत बनता है। कथन 2 में ने + अन में ए के बाद स्वर आता है। अयादि-संधि में स्वर से पहले ए से अय्, ऐ से आय्, ओ से अव् और औ से आव् बनता है, इसलिए ए से अय् होकर नयन बनता है। केवल कथन 1 या केवल कथन 2 को सही मानने वाले विकल्प एक सही कथन को अस्वीकार करते हैं। वे यण् की दिशा को अयादि की दिशा से मिला देते हैं। दोनों को गलत मानने वाला विकल्प भी सही नहीं है। करण को यण् और अयादि अलग रखने के लिए पहले स्वर का वर्ग देखना चाहिए।

प्र.3प्रत्येक जोड़ को उसके संधि-भेद से मिलाइए: (1) भानु + उदय (2) एक + एक (3) इति + आदि।

A 1-गुण, 2-यण्, 3-वृद्धि
B 1-वृद्धि, 2-गुण, 3-दीर्घ
C 1-दीर्घ, 2-वृद्धि, 3-यण्
D 1-यण्, 2-दीर्घ, 3-गुण
व्याख्या

सही उत्तर-मिलान 1-दीर्घ, 2-वृद्धि, 3-यण् है। (1) भानु + उदय में उ से उ मिलता है; दो समान सरल स्वर ऊ में मिलकर भानूदय बनाते हैं, इसलिए यह दीर्घ-संधि है। (2) एक + एक में अ के बाद ए आता है; अ/आ + ए/ऐ से ऐ बनता है, इसलिए एकैक वृद्धि-संधि है। (3) इति + आदि में इ के बाद असमान स्वर आ है; यहाँ इ य् में बदलकर इत्यादि बनाता है, इसलिए यह यण्-संधि है। 1-गुण/2-यण्/3-वृद्धि वाला मिलान उ+उ को गुण और इ+आ को वृद्धि मानता है, इसलिए गलत है। 1-वृद्धि/2-गुण/3-दीर्घ हर युग्म को उलटा रखता है। 1-यण्/2-दीर्घ/3-गुण भानु+उदय को यण् कहता है, जबकि वहाँ कोई इ/उ/ऋ अर्धस्वर नहीं बनता। अशोक के लिए निर्णायक अभ्यास यही है कि प्रत्येक युग्म में दूसरे स्वर की पहचान और उसके वर्ग को अलग-अलग जाँचा जाए।

प्र.4कथन: (i) नमः + ते = नमस्ते क्योंकि अघोष त् से पहले अः में स् रहता है। (ii) वाक् + ईश = वागीश क्योंकि स्वर से पहले अघोष क् घोष ग् बनता है। इनमें से कौन-सा कथन सही है या कौन-से कथन सही हैं?

A केवल (i) सही है
B केवल (ii) सही है
C न (i) न (ii) सही है
D (i) और (ii) दोनों सही हैं
व्याख्या

सही उत्तर यह है कि दोनों कथन सही हैं। कथन (i): नमः + ते में विसर्ग से पूर्व अ है और आगे अघोष दन्त्य त् है; यहाँ विसर्ग स् रूप में आता है, अतः नमस्ते — दिया कारण सही। कथन (ii): वाक् + ईश में शब्दान्त अघोष कण्ठ्य क् स्वर (घोष परिवेश) से पूर्व है और घोषीकरण से ग् बनता है, अतः वागीश — यह भी सही। दोनों जोड़ और दोनों कारण पाठ्य-मानक हैं। केवल-(i)-सत्य वाला चयन और केवल-(ii)-सत्य वाला चयन विसर्ग-नियम को व्यंजन-घोष नियम से अलग कर एक मान्य कथन नकारते हैं; न-दोनों-सत्य वाला चयन दोनों को ग़लत नकारता है यद्यपि प्रत्येक कारण स्वतंत्र रूप से ठोस है। करण के साथ अभ्यस्त अनुशासन: प्रत्येक कथन के लिए आगे के वर्ण का घोष स्वतंत्र रूप से जाँचो।

प्र.5संधि कीजिए: विद्या + आलय। जुड़ा रूप और उसका भेद क्या है?

A विद्यालय — दीर्घ-संधि
B विद्यअलय — गुण-संधि
C विद्यैलय — वृद्धि-संधि
D विद्य्यालय — यण्-संधि
व्याख्या

सही उत्तर दीर्घ-संधि से बना ‘विद्यालय’ है। ‘विद्या + आलय’ में संधि-स्थल पर ‘आ’ और ‘आ’ मिलते हैं, यानी दो समान सरल दीर्घ स्वर। दीर्घ-संधि ऐसे समान या सजातीय सरल स्वरों को एक दीर्घ रूप में मिला देती है, इसलिए रूप ‘विद्यालय’ बनता है। ‘गुण’ वाला ‘विद्यअलय’ गलत है, क्योंकि गुण के लिए अ/आ के साथ इ, उ या ऋ जैसा भिन्न स्वर चाहिए; यहाँ आ + आ है। ‘वृद्धि’ वाला ‘विद्यैलय’ भी अधिक बढ़ा हुआ रूप है, क्योंकि वृद्धि के लिए आगे ए, ऐ, ओ या औ चाहिए। ‘यण्’ वाला ‘विद्य्यालय’ तभी बनता है जब इ, उ या ऋ के बाद असमान स्वर आए; यहाँ ऐसा परिवेश नहीं है। अतः केवल दीर्घ-संधि लागू होती है। देविका को यही संकेत दिया गया कि पहले दोनों स्वरों का समान सरल वर्ग देखो।

आपने 9 में से 5 नमूना प्रश्न देख लिए हैं

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और प्रश्न

6च, छ, ज, झ, ञ व्यंजन किस उच्चारण-स्थान के हैं?

Aकण्ठ्य
Bमूर्धन्य ध्वनि
Cतालव्य
Dओष्ठ्य

7अभिकथन (A): जगत् + नाथ = जगन्नाथ। कारण (R): अन्त्य त् आगे के नासिक्य न् से पूर्व उसी नासिक्य में मिल जाता है।

AA सत्य है, R असत्य है
BA असत्य है, R सत्य है
CA सत्य, R सत्य, पर R, A की व्याख्या नहीं करता
DA सत्य, R सत्य, और R, A की सही व्याख्या करता है

8विसर्ग-संधि कीजिए: मनः + रथ। जुड़ा रूप क्या है?

Aमनःरथ
Bमनोरथ
Cमनस्रथ
Dमनर्रथ

9निम्न में से कौन-सा सही दीर्घ-संधि जोड़ है?

Aरवि + इन्द्र = रवीन्द्र
Bरवि + इन्द्र = रवेन्द्र
Cरवि + इन्द्र = रवैन्द्र
Dरवि + इन्द्र = रव्यिन्द्र

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