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संस्कृत भाषा-अर्जन — सिद्धांत एवं रणनीतियाँ MCQ - उत्तर सहित अभ्यास प्रश्न

RAS/RPSC तैयारी के लिए संस्कृत भाषा-अर्जन — सिद्धांत एवं रणनीतियाँ के 6 प्रश्न हल करें।

अभ्यास प्रश्न

प्र.1कक्षा 4 के बच्चों को संस्कृत पढ़ाने में समझ में आने वाली भाषा-सामग्री पर आधारित शिक्षण से जुड़े दो कथन देखें। कथन 1: छात्र के वर्तमान स्तर से थोड़ा ऊपर की समझ में आने वाली भाषा-सामग्री भाषा-अर्जन में सहायक होती है। कथन 2: भाषा-सामग्री हमेशा केवल उन शब्दों तक सीमित रहनी चाहिए जिन्हें बच्चा हिंदी में पहले से जानता हो। कौन-सा कथन सही है?

A केवल कथन 1 सही है; कथन 2 मिलने वाली भाषा-सामग्री को पहले से ज्ञात हिंदी शब्दावली तक सीमित कर देने की त्रुटि करता है।
B केवल कथन 2 सही है; कथन 1 ऐसा स्तर माँगता है जिसे कक्षा 4 का कोई बच्चा संस्कृत में सँभाल नहीं सकता।
C दोनों कथन सही हैं और प्राथमिक स्तर पर संस्कृत में आगत से जुड़े एक ही सिद्धांत का वर्णन करते हैं।
D कोई भी कथन सही नहीं है क्योंकि शास्त्रीय भाषा पर आगत के सिद्धांत लागू नहीं होते।
व्याख्या

द्वितीय-भाषा अर्जन सिद्धांत का सुबोध-आगत नियम कहता है कि जब छात्र को उसकी वर्तमान क्षमता से एक पायदान ऊपर की भाषा संदर्भ सहित मिलती है, तभी उसका विकास होता है। कक्षा 4 के संस्कृत के लिए इसका अर्थ है कि छोटे श्लोक और संवादों में कुछ नए शब्द परिचित शब्दों के बीच आएँ। आगत को केवल बच्चे की पूर्व-ज्ञात हिंदी शब्दावली तक सीमित कर देने से अर्जन रुक जाएगा।

प्र.2कक्षा 4 के संस्कृत कालांश में छोटे श्लोक से परिचय कराने के लिए निम्नलिखित शिक्षक-गतिविधियों को प्राथमिक स्तर पर सीखने के अनुकूल क्रम में लगाइए। 1. श्लोक का धीमा सामूहिक उच्चारण, पंक्ति-दर-पंक्ति कराइए। 2. सहायक भाषा में एक मिनट की कथा से श्लोक की परिस्थिति स्पष्ट कराइए। 3. हर बच्चे से छपा श्लोक मौन पठन कराइए और एक परिचित शब्द को घेरने को कहिए। 4. पाठ्यपुस्तक से एक चित्र दिखाइए और उसमें तीन प्रमुख संस्कृत शब्द नाम लेकर पहचान कराइए।

A 1, 2, 4, 3
B 2, 4, 1, 3
C 3, 1, 4, 2
D 4, 3, 2, 1
व्याख्या

प्राथमिक स्तर पर क्रम पहले परिस्थिति से शुरू होता है। फिर चित्र-आधारित शब्दावली आती है, उसके बाद निर्देशित सामूहिक उच्चारण और अंत में मुद्रित पाठ का मौन कार्य रखा जाता है। इसलिए परिस्थितिजन्य कथा (2) कालांश खोलती है। तीन नामित संस्कृत शब्दों वाला चित्र (4) अर्थ को स्थिर करता है। धीमा सामूहिक उच्चारण (1) सुनने और बोलने का अभ्यास कराता है, और छपे पाठ का मौन कार्य (3) अंत में आता है। यही क्रम विकल्प B से मेल खाता है।

प्र.3कक्षा 3 की शिक्षिका NCERT प्राथमिक संस्कृत पाठ्यपुस्तक से चार पंक्तियों का एक श्लोक परिचित कराना चाहती हैं। कहानी से शब्दावली सिखाने के सिद्धांत के अनुसार कक्षा में कौन-सा कदम सबसे उपयुक्त होगा?

A श्लोक की परिस्थिति को समेटने वाली एक संक्षिप्त कहानी हिंदी में सुनाएँ, उसमें कुछ प्रमुख संस्कृत संज्ञाएँ पहचान कर बच्चों को बताएँ, और तभी बच्चों के साथ श्लोक का सामूहिक उच्चारण करें।
B श्लोक श्यामपट्ट पर लिखें और सामूहिक उच्चारण से पहले हर शब्द को धातु, उपसर्ग और प्रत्यय में तोड़ने को कहें।
C श्लोक पर्चियों पर बाँट दें, बच्चों को तीन बार मौन पठन करने को कहें, और बिना किसी मौखिक या कहानी से जुड़ी गतिविधि के कालांश समाप्त करें।
D पहले-पहल श्लोक का शब्द-शब्द राजस्थानी अनुवाद करें, फिर हर अनूदित शब्द पर प्रत्येक बच्चे की अलग-अलग जाँच लें।
व्याख्या

कहानी से शब्दावली सीखने का सिद्धांत कहता है कि नए शब्द तभी टिकते हैं जब वे किसी याद रह जाने वाली परिस्थिति में जुड़े हों। हिंदी में एक छोटी कथा चित्र को बाँध देती है, शिक्षिका उसी चित्र के भीतर के कुछ प्रमुख संस्कृत शब्दों को नाम लेकर पहचान कराती है, और इसके बाद सामूहिक उच्चारण अर्थ के साथ आता है। बाकी विकल्प या तो कथा को छोड़ देते हैं, या उसे अमूर्त विश्लेषण से बदल देते हैं, या सीखने को जाँच से बदल देते हैं।

प्र.4प्राथमिक स्तर की संस्कृत शिक्षण पद्धति (सूची 1) को उसकी मुख्य कक्षा-अपेक्षा (सूची 2) से मिलाइए। सूची 1: 1. मौखिक जप विधि 2. कथा-कथन विधि 3. प्रत्यक्ष विधि 4. संभाषण-संस्कृत विधि सूची 2: पी. याद रह गई परिस्थिति में नए शब्दों को जोड़कर शब्दावली विकसित करना क्यू. अर्थ स्पष्ट करने में हाव-भाव और चित्रों की सहायता लेते हुए सभी कक्षा-व्यवहार लक्ष्य भाषा में करना आर. पढ़ने या लिखने से पहले कान को ध्वनि और लय से परिचित कराना एस. अभिवादन, अनुरोध और सरल भूमिका-अभिनय जैसे दैनिक संवादों का अभ्यास कराना

A 1-P, 2-R, 3-Q, 4-S
B 1-R, 2-P, 3-Q, 4-S
C 1-Q, 2-S, 3-R, 4-P
D 1-S, 2-Q, 3-P, 4-R
व्याख्या

सामूहिक उच्चारण सुनकर भाषा से परिचय (R) से जुड़ता है — इसका मूल उद्देश्य लिपि से पहले लय और ध्वनि है। कथा-कथन नए शब्दों को संदर्भ में समझाने (P) से जुड़ता है। प्रत्यक्ष विधि सभी कक्षा-कार्यों में लक्ष्य भाषा और हाव-भाव के प्रयोग (Q) से जुड़ती है। संभाषण-संस्कृत दैनिक संवाद, अभिवादन और भूमिका-अभिनय (S) से जुड़ती है। केवल विकल्प B में चारों जोड़ियाँ सही बैठती हैं।

प्र.5राजस्थान के प्राथमिक विद्यालय में संस्कृत का परिचय कराने के लिए ऐसी कौन-सी पद्धति सबसे उपयुक्त है जो इस सिद्धांत से मेल खाती है कि सुनना और बोलना, पढ़ने-लिखने से पहले आते हैं?

A पहली दस कक्षाओं में श्यामपट्ट से देवनागरी अक्षरों की नकल अभ्यास-पुस्तिका में करवाकर प्रारंभ करें।
B किसी पठन या लेखन कार्य से पहले सरल श्लोकों का सामूहिक उच्चारण और छोटे-छोटे बातचीत के वाक्य कराकर प्रारंभ करें।
C हर वाक्य का हिंदी अनुवाद देते हुए विभक्ति और धातु-रूप के व्याकरण-नियमों से प्रारंभ करें।
D बच्चों से संस्कृत कहानी का मौन पठन कराते हुए शिक्षक श्यामपट्ट पर अर्थ लिखकर प्रारंभ करें।
व्याख्या

प्राथमिक स्तर पर नई भाषा का परिचय भारी पठन, लेखन और व्याकरण-भार से पहले अर्थपूर्ण सुनने और बोलने से कराना बेहतर होता है। छोटे श्लोकों का सामूहिक उच्चारण और सरल संभाषण-वाक्य बच्चों को लिपि-अभ्यास और औपचारिक व्याकरण से पहले संस्कृत की ध्वनि और लय से परिचित कराते हैं। इसलिए विकल्प B इस सिद्धांत से सबसे अच्छी तरह मेल खाता है।

आपने 6 में से 5 नमूना प्रश्न देख लिए हैं

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और प्रश्न

6कक्षा 3 से 5 में संस्कृत के परिचय के दौरान हिंदी या राजस्थानी को सहायक भाषा के रूप में प्रयोग करने पर निम्नलिखित कथन देखें। 1. सहायक भाषा का प्रयोग प्रसंग समझाने, ज़रूरत पड़ने पर किसी शब्द का अर्थ बताने और अटकाव दूर करने में होता है। 2. जब भी कोई बच्चा अनिश्चित दिखे, सहायक भाषा पूरे पाठ के लिए संस्कृत की जगह ले लेती है। 3. वर्ष-भर में, जैसे-जैसे बच्चे में संस्कृत सुनने-समझने की आदत बनती है, शिक्षक सहायक भाषा को धीरे-धीरे घटाता है। 4. कोई संस्कृत श्लोक केवल सहायक भाषा में ही ज़ोर से बोलकर पढ़ा जा सकता है। ऊपर दिए कथनों में से कितने सही हैं?

Aदो
Bतीन
Cएक
Dचार

भाषा I — संस्कृत में और विषय

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