राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ने कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय को भारत में धान के खेतों से नाइट्रस ऑक्साइड (N2O) उत्सर्जन पर एक व्यापक रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है। अधिकरण ने एक ऐसी याचिका पर कार्यवाही की, जिसमें अनियंत्रित कृषि ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन, विशेषकर धान की खेती से होने वाले उत्सर्जन के गंभीर जलवायु प्रभावों को रेखांकित किया गया है।

N2O 100 वर्ष की अवधि में कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) की तुलना में लगभग 300 गुना अधिक शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैस है। CO2 के विपरीत, N2O समताप मंडल की ओजोन परत को भी नुकसान पहुंचाती है, जिससे इसका पर्यावरणीय नुकसान और बढ़ जाता है। भारत विश्व के सबसे बड़े चावल उत्पादकों में से एक है और उसके विशाल धान खेती क्षेत्रों में नाइट्रोजन उर्वरकों के प्रयोग तथा जलमग्न खेतों में सूक्ष्मजीव गतिविधि से बड़ी मात्रा में N2O उत्सर्जित होती है।

NGT ने विशेष रूप से कृषि मंत्रालय से धान के खेतों से N2O उत्सर्जन कम करने के लिए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) द्वारा विकसित छह रणनीतियों की रूपरेखा प्रस्तुत करने को कहा है। इन ICAR रणनीतियों में शामिल हैं: फसल की जरूरत के अनुसार नाइट्रोजन आपूर्ति; खनिज नाइट्रोजन संचय सीमित करने के लिए परती अवधि कम करना; नाइट्रोजन को किस्तों में देने की योजनाओं को बेहतर बनाना; नियंत्रित या धीमी-रिलीज उर्वरकों का उपयोग; नाइट्रीफिकेशन अवरोधकों का उपयोग; और जुताई, सिंचाई तथा जलनिकासी को बेहतर बनाना।

यह निर्णय पेरिस समझौते के तहत भारत के राष्ट्रीय निर्धारित योगदान (NDC) के लिहाज से महत्वपूर्ण है। भारत ने 2030 तक GDP की उत्सर्जन तीव्रता को 45% कम करने की प्रतिबद्धता जताई है। कृषि क्षेत्र, जो भारत के कुल GHG उत्सर्जन में लगभग 14% का योगदान देता है, NDC लक्ष्यों को पूरा करने के लिए एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है।

RPSC अभ्यर्थियों के लिए यह मुद्दा पर्यावरण कानून (NGT क्षेत्राधिकार), जलवायु विज्ञान (GHG), कृषि नीति (ICAR) और भारत की अंतर्राष्ट्रीय जलवायु प्रतिबद्धताओं को जोड़ता है।