पंजाब को सितंबर 2025 की शुरुआत में 1988 के बाद से सबसे भीषण बाढ़ संकट का सामना करना पड़ा, जिसमें 13 जिलों के 1,400 से अधिक गांव गंभीर रूप से प्रभावित हुए। हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर के ऊपरी जलग्रहण क्षेत्रों में भारी मानसूनी बारिश और पोंग, रणजीत सागर तथा भाखड़ा बांधों से अतिरिक्त पानी छोड़े जाने के कारण रावी, ब्यास और सतलुज नदियों में बाढ़ और तेज हो गई। स्थिति तब और बिगड़ गई जब कई नदियां एक साथ खतरे के निशान को पार कर गईं।

पंजाब में 357.1 मिमी के मौसमी औसत के मुकाबले 443 मिमी वर्षा दर्ज की गई, जो सामान्य मानसूनी वर्षा से 24% अधिक है। सबसे अधिक प्रभावित जिलों में गुरदासपुर, अमृतसर, फिरोजपुर, पठानकोट और कपूरथला शामिल थे, जहां कृषि भूमि के बड़े क्षेत्र, विशेष रूप से रोपाई के लिए तैयार धान के खेत, जलमग्न हो गए। सुरक्षा की दृष्टि से 27 अगस्त से 7 सितंबर तक स्कूल और कॉलेज बंद रखे गए, जिससे 8 लाख से अधिक छात्र प्रभावित हुए।

राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (NDRF) ने बचाव और राहत कार्यों के लिए प्रभावित जिलों में 15 टीमें तैनात कीं। राज्य सरकार ने बाढ़ प्रभावित परिवारों के लिए 1,000 करोड़ रुपये के राहत पैकेज की घोषणा की, जिसमें फसल क्षति के लिए प्रति एकड़ के आधार पर मुआवजा निर्धारित किया गया। 50,000 से अधिक लोगों को सरकारी स्कूलों और सामुदायिक केंद्रों में स्थापित राहत शिविरों में स्थानांतरित किया गया।

बाढ़ ने पंजाब में बांध प्रबंधन नियमों और बाढ़-क्षेत्रों में अतिक्रमण पर सवाल खड़े किए। विशेषज्ञों ने सिंधु नदी प्रणाली में ऊपरी और निचले राज्यों के बीच बेहतर समन्वय की मांग की।