भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने अखिल भारतीय प्राकृतिक कृषि नेटवर्क कार्यक्रम के तहत 2020-21 में अध्ययन शुरू किया। पहले यह जैविक कृषि का अखिल भारतीय नेटवर्क कार्यक्रम था। इसके 20 सहयोगी केंद्र 16 राज्यों में फैले हैं और इसमें 8 प्रमुख फसल प्रणालियों का आकलन किया जा रहा है। कार्यक्रम में 11 राज्य कृषि विश्वविद्यालय, 8 परिषद संस्थान या केंद्र और 1 डीम्ड विश्वविद्यालय शामिल हैं। शोध में पाया गया कि सही तकनीक और संतुलित तरीके से प्राकृतिक खेती अपनाने पर पैदावार सुधर सकती है। मल्चिंग से मिट्टी की नमी बनी रहती है, खरपतवार काबू में रहते हैं और जैविक पदार्थ बढ़ता है। बहु-फसली खेती से खेत की जैव विविधता बढ़ती है, कीट और रोग घटते हैं तथा पोषक तत्वों का बेहतर उपयोग होता है। पांच साल के परीक्षणों में हिमालयी क्षेत्रों की सोयाबीन-मक्का-सब्जी मटर-धनिया फसल प्रणाली की औसत उत्पादकता 6,475 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर प्रति वर्ष रही, जो जैविक खेती या एकीकृत फसल प्रबंधन से लगभग 5% अधिक थी। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की सोयाबीन-मक्का-गेहूं-सरसों प्रणाली में यह आंकड़ा 3,346 किलोग्राम रहा और दोनों दूसरी पद्धतियों के बराबर पाया गया। गुजरात और राजस्थान की लोबिया-मक्का या मूंगफली-तिल-सौंफ-फूलगोभी या पत्तागोभी प्रणाली में 9,209 किलोग्राम उत्पादकता दर्ज हुई, जो एकीकृत फसल प्रबंधन के बराबर थी। प्राकृतिक खेती वाले खेतों में 2-3 साल में मिट्टी का जैविक कार्बन बढ़ा; हिमालयी परीक्षणों में यह लगभग 0.90% से 1.15% हुआ। नीति आयोग के आकलन में लगभग 91.2% किसानों ने पैदावार और मिट्टी की दशा सुधरने तथा 90.1% ने उत्पादन लागत घटने की बात कही। मिशन के तहत प्रति किसान अधिकतम 1 एकड़ के लिए 2 साल तक ₹4,000 प्रति एकड़ सालाना सहायता दी जाएगी।