भारत ने मार्च 2026 में केंद्रीय मंत्रिमंडल की मंजूरी के बाद अप्रैल 2026 में UNFCCC को 2031-2035 के लिए अपना राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDC) भेजा। यह ब्राजील के बेलेम में हुए COP30 शिखर सम्मेलन से पहले किया गया। यह भारत की दीर्घकालिक विकार्बनीकरण योजना में एक महत्वपूर्ण कदम है।

नए NDC में 2005 के स्तर की तुलना में 2035 तक उत्सर्जन तीव्रता घटाने का लक्ष्य 45% से बढ़ाकर 47% कर दिया गया है। आधिकारिक NDC के अनुसार भारत की उत्सर्जन तीव्रता 2019 तक 33% से अधिक और 2020 तक 36% घट चुकी थी। 2035 तक कुल स्थापित क्षमता में गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित बिजली क्षमता का लक्ष्य भी 50% से बढ़ाकर 60% किया गया है, जो सौर, पवन और अन्य नवीकरणीय स्रोतों के तेज विस्तार को दर्शाता है।

भारत की जलवायु प्रतिबद्धताएं CBDR के सिद्धांत पर आधारित हैं। भारत का तर्क है कि उसका प्रति व्यक्ति उत्सर्जन वैश्विक औसत से काफी कम है, जबकि वह दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ते नवीकरणीय ऊर्जा बाजारों में से एक है।

NDC भारत के 2070 तक शुद्ध-शून्य उत्सर्जन के समग्र लक्ष्य के अनुरूप है। मुख्य साधनों में राष्ट्रीय सौर मिशन, PM-KUSUM योजना, अपतटीय पवन नीति और ग्रीन हाइड्रोजन मिशन शामिल हैं। COP30 में भारत विकसित देशों से अधिक जलवायु वित्त की प्रतिबद्धताओं और हानि एवं क्षति कोष के संचालन की मांग करेगा।