13 अप्रैल 2026 के आसपास सामने आए एक अहम घटनाक्रम में भारत ने वर्ष 2028 में होने वाले संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन रूपरेखा संधि (यूएनएफसीसीसी) के 33वें पक्षकार सम्मेलन (कॉप33) की मेज़बानी के लिए अपनी बोली औपचारिक रूप से वापस ले ली है। भारत ने यह फैसला राजनयिक स्तर पर यूएनएफसीसीसी सचिवालय और एशिया-प्रशांत क्षेत्रीय समूह को बता दिया। परंपरागत घूर्णन अध्यक्षता प्रणाली के तहत कॉप33 की मेज़बानी का अधिकार इसी समूह को मिलना था। भारत सरकार ने इस फैसले के कई कारण बताए, जिनमें कॉप के आयोजन का भारी लॉजिस्टिक दबाव (लगभग दो सौ पक्षकारों, नागरिक समाज और मीडिया से चालीस हजार से अधिक प्रतिनिधि), सुरक्षा संबंधी पहलू, आधारभूत संरचना की तैयारी की समय-सीमा और घरेलू प्राथमिकताएँ शामिल हैं। भारत के हटने के बाद ऑस्ट्रेलिया और प्रशांत जलवायु साझेदारी के तहत प्रशांत द्वीप राज्यों की संयुक्त बोली अब 2028 की अध्यक्षता की दौड़ में सबसे आगे है। ऑस्ट्रेलिया प्रशांत-नेतृत्व वाली कॉप की पैरवी करता रहा है, जो तुवालु, फिजी, किरिबाती और वानुआतू जैसे निचले द्वीप राष्ट्रों के लिए समुद्र-स्तर वृद्धि से जुड़े अस्तित्व के जोखिमों को रेखांकित करे और अनुकूलन वित्त को नील अर्थव्यवस्था संक्रमण से जोड़े। भारत के लिए यह वापसी जलवायु कूटनीति से पीछे हटना नहीं है। नई दिल्ली सामान्य किंतु विभेदित उत्तरदायित्व और संबंधित क्षमता (सीबीडीआर-आरसी) के सिद्धांत की पैरोकार बनी हुई है, कॉप27 शर्म-एल-शेख में स्थापित हानि एवं क्षति कोष के क्रियान्वयन पर बल देती है, और पेरिस समझौते के तहत अपने अद्यतन राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (एनडीसी) को पूरा करने की दिशा में आगे बढ़ रही है। इसमें 2030 तक पाँच सौ गीगावाट गैर-जीवाश्म स्थापित क्षमता और 2005 के स्तरों से जीडीपी की उत्सर्जन तीव्रता में पैंतालीस प्रतिशत की कमी शामिल है। भारत संसाधन-गहन मेज़बान की भूमिका से एक कदम पीछे हटकर ठोस वार्ता नेतृत्व, दक्षिण-दक्षिण जलवायु सहयोग और हरित हाइड्रोजन मिशन, फेम-तीन विद्युत गतिशीलता प्रोत्साहन तथा बड़े सौर विस्तार से अपने घरेलू संक्रमण पर ध्यान केंद्रित करेगा।
भारत ने वर्ष 2028 में संयुक्त राष्ट्र जलवायु सम्मेलन कॉप33 की मेज़बानी के लिए अपनी दावेदारी वापस ली; ऑस्ट्रेलिया-प्रशांत संयुक्त दावेदारी सबसे आगे
भारत ने वर्ष 2028 में संयुक्त राष्ट्र जलवायु सम्मेलन कॉप33 की मेज़बानी की अपनी दावेदारी वापस ले ली, जिससे ऑस्ट्रेलिया-प्रशांत की संयुक्त दावेदारी सबसे आगे बनी हुई है। भारत ने लॉजिस्टिक, सुरक्षा एवं घरेलू प्राथमिकताओं का हवाला दिया। भारत पेरिस एनडीसी लक्ष्यों—पाँच सौ गीगावाट गैर-जीवाश्म क्षमता तथा 2030 तक उत्सर्जन तीव्रता में पैंतालीस प्रतिशत कटौती—पर कायम है तथा जलवायु वार्ताओं में सीबीडीआर-आरसी एवं हानि व क्षति कोष के क्रियान्वयन पर बल देता रहेगा।
मुख्य तथ्य
- भारत ने वर्ष 2028 के लिए कॉप33 की मेज़बानी की दावेदारी वापस ली
- ऑस्ट्रेलिया-प्रशांत की संयुक्त दावेदारी 2028 की अध्यक्षता के लिए सबसे आगे
- भारत ने लॉजिस्टिक प्रभावों, सुरक्षा और घरेलू प्राथमिकताओं का हवाला दिया
- भारत पेरिस एनडीसी पर कायम है: 2030 तक पाँच सौ गीगावाट गैर-जीवाश्म क्षमता और पैंतालीस प्रतिशत उत्सर्जन तीव्रता कटौती
- नई दिल्ली सीबीडीआर-आरसी सिद्धांत की पैरोकार बनी है
- हानि एवं क्षति कोष का क्रियान्वयन प्राथमिकता बना हुआ है
- प्रशांत क्षेत्र की मांग लघु द्वीपीय राज्यों के लिए समुद्र-स्तर वृद्धि के खतरे पर बल देती है
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भारत ने वर्ष 2028 में प्रस्तावित कॉप33 की मेज़बानी की अपनी दावेदारी वापस ले ली, जिससे ऑस्ट्रेलिया-प्रशांत की संयुक्त दावेदारी सबसे आगे हो गई है। पक्षकारों का सम्मेलन (कॉप) किस अंतर्राष्ट्रीय संधि के अंतर्गत हर वर्ष आयोजित होता है?
जलवायु COP संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन रूपरेखा संधि (UNFCCC) के तहत होता है, जिसे 1992 के रियो पृथ्वी सम्मेलन में अपनाया गया था। COP इस संधि का सर्वोच्च निर्णायक निकाय है और 1995 से हर साल इसकी बैठक होती आई है (महामारी के कारण 2020 को छोड़कर)। जैव विविधता संधि, मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल और CITES के भी अपने पक्षकार सम्मेलन होते हैं, लेकिन जलवायु से जुड़ी खबरों में COP शब्द खास तौर पर UNFCCC जलवायु COP के लिए ही इस्तेमाल होता है। साल 2028 का COP33, साल 2026 के COP31 और साल 2027 के COP32 के बाद होगा, जिसमें अध्यक्षता संयुक्त राष्ट्र के क्षेत्रीय समूहों के बीच बारी-बारी से घूमती है।
स्रोत: समाचार स्रोत
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
यूएनएफसीसीसी के अंतर्गत कॉप क्या है?
पक्षकारों का सम्मेलन (कॉप) यूएनएफसीसीसी का सर्वोच्च निर्णय लेने वाला निकाय है। इसकी बैठक हर वर्ष होती है। यह संधि और उससे जुड़े किसी भी स्वीकृत विधिक साधन के क्रियान्वयन की समीक्षा करता है तथा संधि के प्रभावी क्रियान्वयन को बढ़ावा देने के लिए निर्णय लेता है, जिनमें संस्थागत और प्रशासनिक व्यवस्थाएँ भी शामिल हैं।
हानि एवं क्षति कोष क्या है?
हानि एवं क्षति कोष एक अलग वैश्विक कोष है, जिसे मिस्र के शर्म-एल-शेख में कॉप27 (2022) में स्थापित किया गया और दुबई में कॉप28 (2023) में क्रियाशील किया गया। यह जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभावों के प्रति विशेष रूप से असुरक्षित विकासशील देशों को आर्थिक और गैर-आर्थिक हानियों से निपटने में सहायता देता है।
पेरिस समझौते के तहत भारत के मुख्य लक्ष्य क्या हैं?
भारत ने वर्ष 2030 तक गैर-जीवाश्म स्रोतों से पाँच सौ गीगावाट स्थापित विद्युत क्षमता हासिल करने, 2005 के स्तरों की तुलना में जीडीपी की उत्सर्जन तीव्रता में पैंतालीस प्रतिशत कमी लाने और वर्ष 2070 तक शुद्ध-शून्य उत्सर्जन प्राप्त करने की प्रतिबद्धता जताई है।
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