नवंबर 2025 के अंत में, भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) ने भारत की अदालतों में लंबित मामलों की गंभीर समस्या से निपटने के लिए एक व्यापक राष्ट्रीय न्यायिक नीति बनाने का आह्वान किया। 2025 तक भारत की न्यायपालिका के सभी स्तरों पर 5 करोड़ से अधिक मामले लंबित हैं — जिला अदालतें (4.4 करोड़), उच्च न्यायालय (~60 लाख) और सर्वोच्च न्यायालय (~80,000)। CJI ने जोर दिया कि व्यवस्था में सुधार जरूरी हैं: न्यायिक रिक्तियाँ भरना (भारत में न्यायाधीश-जनसंख्या अनुपात वैश्विक स्तर पर सबसे कम में से एक है — प्रति 10 लाख लोगों पर ~21 न्यायाधीश, अनुशंसित 50 के विरुद्ध), AI-आधारित मामलों के प्रबंधन की प्रणाली अपनाना, लोक अदालतों और मध्यस्थता सहित वैकल्पिक विवाद समाधान (ADR) तंत्रों का विस्तार, और जघन्य अपराधों, महिला मामलों और POCSO मामलों के लिए फास्ट-ट्रैक अदालतों को मजबूत करना। CJI ने डिजिटल बदलाव की पहल के रूप में ई-कोर्ट मिशन मोड प्रोजेक्ट (चरण III) का भी उल्लेख किया। राजस्थान के लिए, उच्च न्यायालय (जोधपुर और जयपुर पीठ) में बड़ा बैकलॉग है, और राज्य के ग्राम न्यायालय तथा लोक अदालत नेटवर्क ग्रामीण न्याय वितरण के लिए महत्वपूर्ण हैं।
CJI का राष्ट्रीय न्यायिक नीति का आह्वान: लंबित मामलों के संकट का समाधान और न्याय तक पहुंच को मजबूत करना
नवंबर 2025 के अंत में, भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) ने भारत की अदालतों में लंबित मामलों की गंभीर समस्या से निपटने के लिए एक व्यापक राष्ट्रीय न्यायिक नीति की मांग की। 2025 तक भारत की न्यायपालिका के सभी स्तरों पर 5 करोड़ से अधिक मामले लंबित हैं — जिला अदालतें (4.4 करोड़), उच्च न्यायालय (~60 लाख) और सर्वोच्च न्यायालय (~80,000)। CJI ने कहा कि बड़े सुधार जरूरी हैं: न्यायिक रिक्तियाँ भरना (भारत में न्यायाधीश-जनसंख्या अनुपात दुनिया में सबसे कम अनुपातों में से एक है — प्रति 10 लाख लोगों पर ~21 न्यायाधीश, जबकि अनुशंसित संख्या 50 है), AI-आधारित मामलों के प्रबंधन की प्रणाली अपनाना, लोक अदालतों और मध्यस्थता सहित वैकल्पिक विवाद समाधान (ADR) तंत्रों का विस्तार करना, और जघन्य अपराधों, महिला मामलों तथा POCSO मामलों के लिए फास्ट-ट्रैक अदालतों को मजबूत करना। CJI ने डिजिटल बदलाव की पहल के रूप में ई-कोर्ट मिशन मोड प्रोजेक्ट (चरण III) का भी उल्लेख किया। राजस्थान के लिए, उच्च न्यायालय (जोधपुर और जयपुर पीठ) में लंबित मामलों का बड़ा बोझ है, और राज्य के ग्राम न्यायालय तथा लोक अदालत नेटवर्क ग्रामीण न्याय वितरण के लिए महत्वपूर्ण हैं।
मुख्य तथ्य
- CJI ने 5 करोड़ लंबित मामलों के समाधान के लिए व्यापक राष्ट्रीय न्यायिक नीति का आह्वान किया।
- भारत में न्यायाधीश-जनसंख्या अनुपात अनुशंसित 50 के मुकाबले केवल 21 प्रति 10 लाख है।
- प्रस्तावित सुधारों में AI-आधारित मामला प्रबंधन और विस्तारित ADR तंत्र शामिल हैं।
- ई-कोर्ट मिशन मोड परियोजना चरण III का उद्देश्य न्यायपालिका का डिजिटल परिवर्तन है।
- अकेले जिला न्यायालयों में 4.4 करोड़ और उच्च न्यायालयों में 60 लाख मामले लंबित हैं।
- जोधपुर और जयपुर पीठ वाले राजस्थान उच्च न्यायालय में काफी मामले लंबित हैं।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
2025 में CJI के राष्ट्रीय न्यायिक नीति के आह्वान के पीछे लंबित मामलों की क्या स्थिति थी?
2025 तक भारत की अदालतों में 5 करोड़ से अधिक मामले लंबित हैं — जिला अदालतों में 4.4 करोड़, उच्च न्यायालयों में लगभग 60 लाख और सर्वोच्च न्यायालय में करीब 80,000। इस प्रणालीगत संकट के कारण नवंबर 2025 में CJI ने व्यापक राष्ट्रीय न्यायिक नीति का आह्वान किया।
भारत का न्यायाधीश-जनसंख्या अनुपात कितना है और अनुशंसित मानक से कितना कम है?
भारत में प्रति 10 लाख जनसंख्या पर लगभग 21 न्यायाधीश हैं, जबकि अनुशंसित मानक 50 प्रति 10 लाख है। यह कम अनुपात लंबित मामलों के बोझ का एक प्रमुख संरचनात्मक कारण है और प्रस्तावित राष्ट्रीय न्यायिक नीति का मुख्य सुधार बिंदु है।
ई-कोर्ट मिशन मोड परियोजना चरण III क्या है और इसका उद्देश्य क्या है?
ई-कोर्ट मिशन मोड परियोजना चरण III भारत की न्यायपालिका के डिजिटल रूपांतरण की सरकारी पहल है — इसमें मामलों की ऑनलाइन फाइलिंग, वर्चुअल सुनवाई, डिजिटाइज़्ड रिकॉर्ड और AI की मदद से मामला प्रबंधन शामिल हैं — ताकि देरी कम हो और न्याय तक पहुँच बेहतर हो।
CJI ने लंबित मामलों के संकट को दूर करने के लिए कौन से प्रणालीगत सुधार जरूरी बताए?
CJI ने न्यायिक रिक्तियाँ जल्द भरने, वैकल्पिक विवाद समाधान (ADR) तंत्र का विस्तार करने, AI-आधारित केस प्रबंधन प्रणाली लागू करने और ई-कोर्ट चरण III के जरिए डिजिटल अदालती ढांचे को मजबूत करने पर जोर दिया — ये अलग-अलग कदम नहीं, बल्कि समग्र उपाय हैं।
भारत की न्यायिक लंबितता की समस्या में राजस्थान किस प्रकार प्रासंगिक है?
राजस्थान उच्च न्यायालय, जिसकी पीठें जोधपुर (प्रमुख पीठ) और जयपुर में हैं, में मुकदमों की बड़ी लंबित संख्या है, जो राष्ट्रीय स्तर की समस्या को दिखाती है। न्यायिक रिक्तियाँ भरने और डिजिटाइज़ेशन से जुड़े सुधार राजस्थान के लिए विशेष रूप से प्रासंगिक हैं।
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