सर्वोच्च न्यायालय ने देशभर में मानव तस्करी के मामलों से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए व्यावहारिक, समयबद्ध और एकसमान मानक संचालन प्रक्रिया बनाने का निर्देश दिया। न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने ज़ोर दिया कि यह प्रक्रिया स्थानीय थाने में लागू की जा सके और केवल सैद्धांतिक या अकादमिक अभ्यास बनकर न रह जाए। न्यायालय ने तस्करी से निपटने का व्यावहारिक ढाँचा तैयार करने के लिए विशेषज्ञों की मुख्य समिति गठित की। इसमें भारतीय पुलिस सेवा के पूर्व अधिकारी पी.एम. नायर, गृह मंत्रालय के निदेशक वीरेंद्र कुमार मिश्रा और अपर सॉलिसिटर जनरल एस.डी. संजय शामिल हैं; एस.डी. संजय इसके संयोजक और समन्वयक हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने मानव तस्करी और लापता व्यक्तियों से जुड़े मामले में जवाब दाखिल न करने वाले कई राज्यों को चेतावनी दी। न्यायालय ने इन राज्यों के पुलिस महानिदेशकों को 16 अप्रैल 2026 तक व्यक्तिगत रूप से सत्यापित शपथपत्र दाखिल करने का निर्देश दिया; ऐसा न करने पर उन्हें न्यायालय में व्यक्तिगत रूप से पेश होना होगा। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि वह काल्पनिक रूपरेखा नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था चाहता है जिसे स्थानीय थाने में तुरंत लागू किया जा सके। मानव तस्करी एक गंभीर अपराध है, जिसमें जबरन श्रम, यौन शोषण और अंग तस्करी शामिल हैं। इससे लाखों लोग, खासकर महिलाएँ और बच्चे, प्रभावित होते हैं। भारत में बच्चों को यौन अपराधों से संरक्षण अधिनियम और अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम इसके खिलाफ प्रमुख कानून हैं, लेकिन ज़मीनी स्तर पर इनका पालन हर जगह एकसमान नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय का हस्तक्षेप इसी कमी को दूर करने के लिए है। इसका उद्देश्य देशभर के स्थानीय थानों के लिए एक ऐसी एकसमान प्रक्रिया बनाना है जिसे वे तुरंत लागू कर सकें। मामले की अगली सुनवाई 21 अप्रैल 2026 को होगी।