प्रकाशित: 21 जनवरी 2026शासन
सुप्रीम कोर्ट ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17A पर विभाजित फैसला सुनाया
सुप्रीम कोर्ट ने 13 जनवरी 2026 को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 17A की संवैधानिक वैधता पर विभाजित फैसला सुनाया। इस प्रावधान के तहत सरकारी कर्तव्य निभाते हुए लिए गए निर्णयों से जुड़े भ्रष्टाचार के आरोपों में लोक सेवकों के विरुद्ध जांच शुरू करने से पहले सरकारी मंजूरी जरूरी है।
एक न्यायाधीश ने इसे भ्रष्टाचार-रोधी कार्रवाई में अनुचित बाधा बताया, जबकि दूसरे ने इसे ईमानदार नौकरशाहों की सुरक्षा के लिए आवश्यक माना। मामला बड़ी पीठ को भेजा गया। धारा 17A 2018 संशोधन द्वारा जोड़ी गई थी।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17A पर सर्वोच्च न्यायालय का विभाजित निर्णय क्या था?
**भारत के सर्वोच्च न्यायालय** ने **भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (PCA), 1988** की **धारा 17A** पर **विभाजित निर्णय** दिया। धारा 17A के तहत आधिकारिक निर्णयों से संबंधित अपराधों में किसी सरकारी कर्मचारी के खिलाफ जांच शुरू करने से पहले **सक्षम प्राधिकरण की पूर्व अनुमति** जरूरी है। न्यायाधीशों के बीच मतभेद के कारण मामला **बड़ी पीठ** को भेजना होगा।
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17A क्या है और यह विवादास्पद क्यों है?
**PCA की धारा 17A** (**2018 संशोधन** द्वारा जोड़ी गई) के अनुसार, पुलिस या CBI को आधिकारिक कर्तव्यों में किए गए कार्यों के लिए **सरकारी कर्मचारी** की जांच से पहले **सरकार की मंजूरी** लेनी होगी। आलोचकों का तर्क है कि यह भ्रष्ट अधिकारियों को बचाती है; समर्थकों का कहना है कि यह ईमानदार अधिकारियों को **राजनीति से प्रेरित मुकदमों** से बचाती है।
सर्वोच्च न्यायालय के विभाजित निर्णय का क्या महत्व है?
**विभाजित निर्णय** तब होता है जब दो या अधिक न्यायाधीश फैसले पर सहमत नहीं होते। ऐसे में मामला **बड़ी पीठ** को भेजा जाता है। धारा 17A मामले में, इस मतभेद का मतलब है कि **सरकारी कर्मचारियों की सुरक्षा की वैधता** कानूनी रूप से तब तक अनिश्चित रहेगी, जब तक बड़ी संवैधानिक पीठ निर्णायक फैसला नहीं देती।
2018 में संशोधित भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 के प्रमुख प्रावधान क्या हैं?
**भ्रष्टाचार निवारण (संशोधन) अधिनियम, 2018** ने प्रमुख बदलाव किए: **धारा 17A** — सरकारी कर्मचारियों की जांच के लिए पूर्व अनुमति, **रिश्वत** की परिभाषा का विस्तार, रिश्वत देने वाले को भी दोषी बनाना, **बढ़ी हुई सज़ाएं** (7 वर्ष तक कारावास), संपत्ति **जब्ती** के प्रावधान और **UNCAC** के अनुरूप संशोधन।
धारा 17A के तहत पूर्व अनुमति की आवश्यकता भारत में भ्रष्टाचार-विरोधी जांच को कैसे प्रभावित करती है?
**धारा 17A के तहत पूर्व अनुमति की आवश्यकता** ने भ्रष्टाचार-विरोधी जांच को काफी धीमा कर दिया है। **CBI और राज्य भ्रष्टाचार-विरोधी ब्यूरो** को IAS, IPS और अन्य वरिष्ठ सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ FIR दर्ज करने से पहले सरकारी अनुमति लेनी होती है। आलोचकों का मानना है कि इससे **संस्थागत भ्रष्टाचार** को सुरक्षा मिलती है।