निखत परवीन उर्फ़ खुशबू खातून बनाम रफ़ीक उर्फ़ शिल्लू मामले में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने 22 अप्रैल 2026 को निर्णय दिया। मामले का उद्धरण लीगल सर्विसेज इंडिया (LSI) में 2026 LSI (उच्चतम न्यायालय) 100 है। न्यायालय ने कहा कि पितृत्व न होने को निर्णायक रूप से सिद्ध करने वाला डीएनए साक्ष्य भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 112 के तहत वैध संतान होने की कानूनी उपधारणा से अधिक प्रभावी है। इसलिए डीएनए साक्ष्य से जैविक पितृत्व गलत सिद्ध हो जाने पर भरण-पोषण का दायित्व नहीं बनता। पीठ ने इस बात पर ज़ोर दिया कि जब अकाट्य जैविक प्रमाण किसी कानूनी उपधारणा को गलत सिद्ध करता है, तब कानून की कल्पित मान्यता के बजाय वैज्ञानिक निश्चितता को स्वीकार किया जाना चाहिए। धारा 112 के अनुसार, वैध विवाह के दौरान जन्मा बच्चा पति की वैध संतान माना जाता है, जब तक यह सिद्ध न हो कि गर्भाधान के समय पति-पत्नी की एक-दूसरे तक पहुँच नहीं थी। लंबे समय से इस उपधारणा को लगभग निर्णायक माना जाता रहा है। यह निर्णय दो दशकों में आए उस न्यायिक बदलाव को स्पष्ट करता है जिसमें माता-पिता की ज़िम्मेदारी तय करते समय हर हाल में सामाजिक वैधता की रक्षा करने के बजाय साक्ष्यों की सटीकता को प्राथमिकता मिली है। साथ ही, निर्णय प्रक्रियात्मक सुरक्षा बनाए रखता है। डीएनए परीक्षण में सहमति लेने और नमूने की अभिरक्षा-शृंखला संबंधी नियमों का सख्ती से पालन करना होगा। विधिसम्मत परीक्षण कराने से बिना उचित कारण इनकार करने पर प्रतिकूल अनुमान लगाया जा सकता है। यह निर्णय देश भर में दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 144 के तहत लंबित भरण-पोषण कार्यवाहियों को प्रभावित करता है। इनमें परिवार न्यायालयों की कार्यवाहियाँ भी शामिल हैं। यह निर्णय अनुच्छेद 21 के तहत गरिमा की संवैधानिक गारंटी और अनुच्छेद 20(3) के तहत आत्म-अभियोग के विरुद्ध अधिकार से भी जुड़ा है।