भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने 21 जनवरी, 2026 को केंद्र सरकार द्वारा अरावली श्रृंखला की पुनर्परिभाषा पर लगी रोक बढ़ा दी। यह कानूनी विवाद राजस्थान के पर्यावरण के लिए गंभीर असर रखता है।

विवाद पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) की 2022 की अधिसूचना से जुड़ा है, जिसमें 100 मीटर न्यूनतम ऊँचाई मानदंड के आधार पर अरावली को फिर से परिभाषित किया गया। इस नई परिभाषा के तहत, सर्वेक्षण की गई 12,081 पहाड़ियों में से केवल 1,048 ही अरावली श्रृंखला का हिस्सा मानी जाती हैं। इससे पहले चिह्नित 91% से अधिक अरावली भूमि नियामक संरक्षण से बाहर हो जाती है।

पर्यावरणविदों और सर्वोच्च न्यायालय के अपने न्यायमित्र ने तर्क दिया है कि यह पुनर्परिभाषा विकास हितों से प्रेरित थी, खासकर हरियाणा (गुरुग्राम-फरीदाबाद पट्टी) और राजस्थान में रियल एस्टेट तथा खनन के लिए भूमि खोलने के उद्देश्य से। मूल अरावली संरक्षण 1992 के सर्वोच्च न्यायालय के आदेश और बाद की व्याख्याओं पर आधारित था, जिनमें ऊँचाई की परवाह किए बिना सन्निहित भूगर्भीय संरचनाएँ शामिल थीं।

राजस्थान के लिए पर्यावरणीय दाँव बहुत बड़े हैं: नई परिभाषा के तहत राजस्थान की 41.8% अरावली प्राकृतिक वनस्पति खतरे में है। अरावली अर्ध-शुष्क क्षेत्र के लिए एक महत्वपूर्ण जल विभाजक का काम करती है और अलवर, जयपुर तथा अजमेर जैसे शहरों के भूजल को रिचार्ज करती है। यह सरिस्का और रणथंभौर टाइगर रिजर्व के बीच एक जैविक गलियारा भी बनाती है।

सर्वोच्च न्यायालय की जारी रोक मामले की पूरी सुनवाई तक विवादित अरावली क्षेत्रों में भूमि उपयोग परिवर्तन रोकती है।