सर्वोच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य में अवैध रेत खनन का स्वतः संज्ञान लिया, राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश को चेतावनी
Aसीधा उत्तर
सर्वोच्च न्यायालय ने 13 मार्च 2026 को राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य (राजस्थान-मध्य प्रदेश-उत्तर प्रदेश त्रिसंगम) में अवैध रेत खनन का स्वतः संज्ञान लिया, निष्क्रियता पर अप्रत्यक्ष दायित्व तय होने की चेतावनी दी और 2 अप्रैल को सुनवाई का आदेश दिया; घड़ियाल आवास को गंभीर खतरा है।
मुख्य तथ्य
सर्वोच्च न्यायालय ने 13 मार्च 2026 को राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य में अवैध रेत खनन का स्वतः संज्ञान लिया — यह संरक्षित क्षेत्र राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में फैला है।
न्यायालय ने चेताया कि अवैध खनन के खिलाफ निष्क्रिय रहने पर राज्य अधिकारियों पर अप्रत्यक्ष दायित्व तय हो सकता है, और 2 अप्रैल 2026 को सुनवाई का निर्देश दिया।
राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य गंभीर रूप से लुप्तप्राय घड़ियाल (Gavialis gangeticus) और लाल-मुकुट वाले छत के कछुए का महत्वपूर्ण आवास है; ये वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की अनुसूची I के तहत संरक्षित हैं।
स्वतः संज्ञान क्षेत्राधिकार के तहत सर्वोच्च न्यायालय बिना औपचारिक याचिका के स्वयं मामले उठा सकता है, आम तौर पर महत्वपूर्ण सार्वजनिक हित या पर्यावरण से जुड़े मामलों में।
चंबल नदी राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के बीच त्रि-सीमा बनाती है; नदी तल में रेत खनन पारिस्थितिक संतुलन बिगाड़ता है और संरक्षित प्रजातियों के घोंसले नष्ट करता है।
यह मामला पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 और वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के अंतर्गत आता है; राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) को भी ऐसे पर्यावरणीय उल्लंघनों पर क्षेत्राधिकार प्राप्त है।
13 मार्च 2026 को न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की सर्वोच्च न्यायालय की पीठ ने राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य में बड़े पैमाने पर हो रहे अवैध रेत खनन का स्वतः संज्ञान लिया — यह मामला 17 मार्च 2026 की समसामयिक कवरेज में प्रमुख रूप से उभरा। न्यायालय ने कहा कि घड़ियाल संरक्षण कार्यक्रम के लिए महत्वपूर्ण संरक्षित क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर अवैध खनन हो रहा है, जिससे गंभीर रूप से संकटग्रस्त घड़ियाल और संकटग्रस्त गंगेटिक नदी डॉल्फिन अपने प्राकृतिक आवास से विस्थापित हो रहे हैं।
राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के त्रिसंगम पर स्थित 5,400 वर्ग किमी का नदी-आधारित संरक्षित क्षेत्र है — यह भारत का पहला और एकमात्र त्रि-राज्यीय नदी अभयारण्य है। यहां विश्व के शेष वन्य घड़ियालों की लगभग 80% आबादी निवास करती है। न्यायालय ने चेतावनी दी कि अवैध खनन रोकने में तीनों राज्यों के अधिकारियों की 'सुस्ती और निष्क्रियता' पर वन्यजीव संरक्षण कानूनों के तहत अप्रत्यक्ष दायित्व लागू होगा। न्यायालय ने दो अधिवक्ताओं को न्याय मित्र नियुक्त किया और मामले को 2 अप्रैल 2026 की सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया।
0
मेन्स दृष्टिकोण
प्रश्न: राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य में अवैध बालू खनन से उत्पन्न पारिस्थितिक एवं शासन संबंधी चुनौतियों की चर्चा कीजिए तथा मार्च 2026 में सर्वोच्च न्यायालय के स्वप्रेरित हस्तक्षेप का मूल्यांकन कीजिए।
उत्तर (50 शब्द):
13 मार्च 2026 को सर्वोच्च न्यायालय ने 5,400 वर्ग कि.मी. के राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य (राजस्थान, मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश के त्रि-संगम) में अवैध बालू खनन पर स्वप्रेरित संज्ञान लिया। यह अभयारण्य विश्व के लगभग 80% जंगली घड़ियालों का आश्रय है। पीठ ने अधिकारियों को जवाबदेही की चेतावनी दी, दो न्याय-मित्र नियुक्त किए और 2 अप्रैल 2026 को सुनवाई तय की।
इस विषय की स्थिर तैयारी
इस खबर के पीछे का स्थायी सिलेबस पढ़ें।
जैव विविधता एवं संरक्षणविज्ञान एवं प्रौद्योगिकीप्राकृतिक वनस्पति, जैव विविधता एवं संरक्षणराजस्थान का भूगोलराजस्थान-विशिष्ट समसामयिकीसमसामयिकी
6-अक्ष वर्गीकरण
कवरेजराजस्थानविषयराष्ट्रीयपरीक्षाबेसिक कंप्यूटर इंस्ट्रक्टर · CET स्नातक · CET सीनियर सेकेंडरी · EO/RO · LDC · महिला पर्यवेक्षक · पटवार · PTI · RAS · REET · RPSC SI · स्कूल व्याख्याता · सीनियर कंप्यूटर इंस्ट्रक्टर · वरिष्ठ अध्यापक · UPSC · वनपाल · दोनोंस्रोतसमाचार स्रोत
13 मार्च 2026 को सर्वोच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य का स्वतः संज्ञान क्यों लिया?
सर्वोच्च न्यायालय ने 13 मार्च 2026 को राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य में अवैध रेत खनन के कारण स्वतः संज्ञान लिया। यह संरक्षित क्षेत्र राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में फैला है। न्यायालय ने राज्य अधिकारियों को निष्क्रियता पर अप्रत्यक्ष दायित्व की चेतावनी दी और 2 अप्रैल 2026 को सुनवाई के निर्देश दिए।
स्वतः संज्ञान क्षेत्राधिकार क्या है और सर्वोच्च न्यायालय इसका उपयोग किन परिस्थितियों में करता है?
स्वतः संज्ञान क्षेत्राधिकार के तहत सर्वोच्च न्यायालय किसी पक्ष की औपचारिक याचिका के बिना स्वयं मामला उठा सकता है। इसका प्रयोग सामान्यतः महत्वपूर्ण सार्वजनिक हित, मौलिक अधिकारों के उल्लंघन या अत्यावश्यक पर्यावरण संबंधी मामलों में किया जाता है, जहाँ याचिकाकर्ता का इंतजार करने से अपूरणीय क्षति हो सकती है।
राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य में कौन-सी लुप्तप्राय प्रजातियाँ निवास करती हैं और उन्हें क्या कानूनी संरक्षण मिलता है?
राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य गंभीर रूप से लुप्तप्राय घड़ियाल (Gavialis gangeticus) और लाल-मुकुट वाले कछुए का अहम आवास है। दोनों प्रजातियाँ वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की अनुसूची I के तहत संरक्षित हैं, जो सबसे ऊँचा कानूनी संरक्षण देती है।
चंबल नदी तीन राज्यों की सीमा कैसे बनाती है और इसमें रेत खनन पारिस्थितिक रूप से हानिकारक क्यों है?
चंबल नदी राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के बीच तीनों राज्यों की सीमा बनाती है। नदी तल में रेत खनन घड़ियाल जैसी संरक्षित प्रजातियों के घोंसले नष्ट करता है और नदी की आकृति तथा जल प्रवाह बदलकर अभयारण्य के पारिस्थितिक संतुलन को बिगाड़ता है।
राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य जैसे संरक्षित वन्यजीव क्षेत्र में अवैध रेत खनन पर किन कानूनों और न्यायाधिकरणों का क्षेत्राधिकार है?
ऐसे क्षेत्रों में अवैध रेत खनन पर पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 और वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 लागू होते हैं। राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) का भी पर्यावरण उल्लंघनों पर क्षेत्राधिकार है, जबकि सर्वोच्च न्यायालय स्वतः संज्ञान या अपील से पर्यवेक्षी क्षेत्राधिकार का प्रयोग कर सकता है।
क्या यह उपयोगी था?
सुधार या छूटा परीक्षा दृष्टिकोण संपादकीय टीम को भेजें।