केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री श्री भूपेंद्र यादव ने राजस्थान के अलवर में 'बाघों का पुनर्वास: अवसर और चुनौतियां' विषय पर राष्ट्रीय कार्यशाला का उद्घाटन किया तथा बाघ संरक्षण और प्रोजेक्ट चीता पर तीन प्रकाशनों का विमोचन किया। यह कार्यशाला राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) द्वारा राजस्थान सरकार के सहयोग से आयोजित की गई, जिसमें क्षेत्रीय निदेशक, मुख्य वन्यजीव वार्डन और वन्यजीव विशेषज्ञ बाघों के पुनर्वास तथा सक्रिय प्रबंधन की विज्ञान-आधारित रणनीतियों पर विचार-विमर्श के लिए एकत्र हुए। सरिस्का टाइगर रिजर्व में बाघ पुनर्वास के 18 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में आयोजित इस कार्यशाला में मंत्री ने कहा कि बाघ संरक्षण केवल एक प्रजाति की रक्षा नहीं, बल्कि वनों, जलक्षेत्रों और समृद्ध जैव विविधता के संरक्षण से भी जुड़ा है। उन्होंने सरिस्का कार्यक्रम को विश्व में बाघों का पहला सफल वैज्ञानिक पुनर्वास बताया, जो उस क्षेत्र में किया गया जहां यह प्रजाति स्थानीय रूप से विलुप्त हो चुकी थी। उन्होंने बताया कि 2005 में स्थानीय विलुप्ति झेलने वाला सरिस्का आज 56 बाघों को आश्रय दे रहा है। मंत्री ने कहा कि पिछले एक दशक में बाघ अभ्यारण्यों की संख्या 46 से बढ़कर 58 हो गई है और भारत ने 2022 तक बाघों की आबादी दोगुनी करने के सेंट पीटर्सबर्ग घोषणा के लक्ष्य को प्राप्त कर लिया है। उन्होंने पन्ना और सरिस्का की सफलता का श्रेय सामुदायिक भागीदारी को दिया, जबकि ओडिशा के सतकोसिया में सामुदायिक सहयोग के अभाव में ऐसी सफलता नहीं मिल सकी। उन्होंने तीन प्रकाशन जारी किए: भारत में बाघों के सक्रिय प्रबंधन पर रोडमैप; भारत में बाघों के पुनर्वास और संरक्षण पर पुस्तिका; तथा प्रोजेक्ट चीता की वार्षिक रिपोर्ट (सितंबर 2024–दिसंबर 2025)। इस अवसर पर राजस्थान के वन मंत्री श्री संजय शर्मा, आईबीसीए के महानिदेशक श्री एसपी यादव, वन महानिदेशक एवं विशेष सचिव श्री सुशील कुमार अवस्थी तथा एनटीसीए के सदस्य सचिव श्री संजय कुमार उपस्थित रहे।