प्रकाशित: 12 नवंबर 2025PIBपर्यावरण
बाकू COP29: जलवायु वित्त पर NCQG के नतीजों से भारत असंतुष्ट
जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र ढांचा अभिसमय (UNFCCC) के पक्षकारों का 29वाँ सम्मेलन (COP29) 11–22 नवंबर 2024 को अज़रबैजान के बाकू में आयोजित हुआ था। इस सम्मेलन में चर्चा का प्रमुख विषय जलवायु वित्त के लिए नया सामूहिक परिमाणित लक्ष्य (NCQG) था। इसे 2009 में कोपेनहेगन में की गई हर वर्ष 100 अरब डॉलर देने की प्रतिबद्धता की जगह लेना था।
भारत ने विकासशील देशों का पक्ष रखते हुए विकसित देशों से जलवायु वित्त के लिए हर वर्ष 1.3 लाख करोड़ डॉलर देने की मांग की। भारत का कहना था कि वैश्विक दक्षिण में जलवायु परिवर्तन के असर के अनुकूल ढलने और स्वच्छ ऊर्जा अपनाने की लागत बहुत अधिक है। NCQG के प्रारंभिक समझौते में हर वर्ष 300 अरब डॉलर देने का प्रस्ताव रखा गया, जिसे भारत और 77 देशों के समूह (G-77) ने "बहुत कम और बहुत देर से मिलने वाला" बताया।
भारत ने साझा किंतु अलग-अलग ज़िम्मेदारियों और संबंधित क्षमताओं (CBDR-RC) के सिद्धांत का हवाला दिया। UNFCCC का यह बुनियादी सिद्धांत मानता है कि कुल उत्सर्जन में ऐतिहासिक रूप से विकसित देशों का योगदान सबसे अधिक रहा है, इसलिए जलवायु कार्रवाई के लिए धन उपलब्ध कराने की उनकी ज़िम्मेदारी भी अधिक है। भारत का तर्क था कि 300 अरब डॉलर पूरे मिलने पर भी यह राशि पर्याप्त नहीं होगी, क्योंकि जलवायु परिवर्तन से अधिक प्रभावित देशों में अनुकूलन की वार्षिक लागत 2030 तक 215–387 अरब डॉलर होने का अनुमान है।
COP29 की एक प्रमुख उपलब्धि पेरिस समझौते के अनुच्छेद 6 के नियमों को अंतिम रूप देना था। ये नियम अंतरराष्ट्रीय कार्बन बाज़ारों और देशों के बीच कार्बन क्रेडिट के व्यापार की व्यवस्था तय करते हैं। इनके तहत देश अपने राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDC) पूरे करने के लिए कार्बन क्रेडिट का व्यापार कर सकते हैं।
राजस्थान के लिए इसका खास महत्व है। चरम गर्मी, मरुस्थलीकरण, अनियमित मानसून और भूजल में गिरावट के कारण राज्य जलवायु परिवर्तन से गंभीर रूप से प्रभावित है। पर्याप्त जलवायु वित्त का राजस्थान की अनुकूलन क्षमता से सीधा संबंध है।
मेन्स दृष्टिकोण
प्रश्न: बाकू में हुए COP29 के दौरान जलवायु वित्त के नए सामूहिक परिमाणित लक्ष्य (NCQG) और पेरिस समझौते के अनुच्छेद 6 को लागू करने के लिए हुए निर्णयों का आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए। साझा किंतु अलग-अलग ज़िम्मेदारियों और संबंधित क्षमताओं (CBDR-RC) के सिद्धांत के संदर्भ में भारत की प्रतिक्रिया का भी विश्लेषण कीजिए।
उत्तर (50 शब्द):
बाकू में 11–22 नवंबर 2024 को हुए COP29 में NCQG के तहत हर वर्ष 300 अरब डॉलर का लक्ष्य तय हुआ। भारत और 77 देशों के समूह (G-77) की मांग हर वर्ष 1.3 लाख करोड़ डॉलर की थी और 2030 तक अनुकूलन की लागत 215–387 अरब डॉलर होने का अनुमान है। इसलिए उन्होंने इस लक्ष्य को 'बहुत कम और बहुत देर से मिलने वाला' बताया। अनुच्छेद 6 के कार्बन बाज़ार संबंधी नियमों को भी अंतिम रूप दिया गया।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
नया सामूहिक परिमाणित लक्ष्य (NCQG) क्या है और COP29 में यह क्यों महत्वपूर्ण था?
नए सामूहिक परिमाणित लक्ष्य (NCQG) को कोपेनहेगन में हुए COP15 के दौरान की गई 100 अरब डॉलर प्रति वर्ष की पुरानी प्रतिबद्धता की जगह लेने के लिए तय किया गया। COP29 में यह जलवायु वित्त पर बातचीत का मुख्य लक्ष्य था और प्रारंभिक समझौते में 300 अरब डॉलर प्रति वर्ष देने का प्रस्ताव रखा गया।
COP29 में जलवायु वित्त पर भारत की क्या मांग थी?
भारत ने विकसित देशों से हर वर्ष 1.3 लाख करोड़ डॉलर की मांग की। भारत का कहना था कि वैश्विक दक्षिण में जलवायु अनुकूलन और स्वच्छ ऊर्जा अपनाने की लागत बहुत अधिक है। भारत और 77 देशों के समूह (G-77) ने 300 अरब डॉलर के परिणाम को 'बहुत कम और बहुत देर से मिलने वाला' बताया।
साझा किंतु अलग-अलग ज़िम्मेदारियों और संबंधित क्षमताओं (CBDR-RC) का सिद्धांत क्या है और भारत ने COP29 में इसका उपयोग कैसे किया?
साझा किंतु अलग-अलग ज़िम्मेदारियों और संबंधित क्षमताओं (CBDR-RC) का सिद्धांत जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र ढांचा अभिसमय (UNFCCC) का हिस्सा है। इसके अनुसार, विकसित देशों ने ऐतिहासिक रूप से अधिक उत्सर्जन किया है, इसलिए उनकी ज़िम्मेदारी भी अधिक है। इसी आधार पर भारत ने तर्क दिया कि समृद्ध देशों को विकासशील देशों की जलवायु कार्रवाई के लिए धन देना चाहिए।
COP29 में पेरिस समझौते के अनुच्छेद 6 पर क्या निर्णय हुआ?
COP29 में पेरिस समझौते के अनुच्छेद 6 के नियमों को अंतिम रूप दिया गया। इन नियमों ने देशों के बीच अंतरराष्ट्रीय कार्बन बाज़ार और कार्बन क्रेडिट के व्यापार की व्यवस्था तय की, ताकि वे अपने राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDC) पूरे कर सकें।
COP29 राजस्थान के लिए कैसे प्रासंगिक है?
राजस्थान पर जलवायु परिवर्तन के गंभीर प्रभाव पड़ रहे हैं: चरम लू, थार में मरुस्थलीकरण, अनियमित मानसून और भूजल में गिरावट। अधिक वैश्विक जलवायु वित्त से राजस्थान की अनुकूलन क्षमता और नवीकरणीय ऊर्जा में निवेश की क्षमता सीधे बढ़ेगी।