संसद ने औद्योगिक संबंध संहिता (संशोधन) विधेयक, 2026 को 12 फरवरी, 2026 को पारित किया — लोकसभा और राज्यसभा दोनों ने उसी दिन इसे मंजूरी दी। यह ऐतिहासिक कानून तीन पुराने श्रम कानूनों को निरस्त करता है: ट्रेड यूनियन अधिनियम 1926, औद्योगिक रोजगार (स्थायी आदेश) अधिनियम 1946, और औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947। ये तीनों कानून दशकों से भारत में औद्योगिक संबंधों को नियंत्रित करते थे, जिनमें कुछ प्रावधान लगभग एक सदी पुराने थे।

यह संशोधन 44 केंद्रीय श्रम कानूनों को केवल 4 संहिताओं में समेकित करने की दीर्घकालिक कोशिश का परिणाम है — यह प्रक्रिया श्रम पर द्वितीय राष्ट्रीय आयोग (2002) के बाद शुरू हुई थी। चारों संहिताएं हैं: मजदूरी संहिता (2019), औद्योगिक संबंध संहिता (2020), सामाजिक सुरक्षा संहिता (2020), और व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्य परिस्थिति संहिता (2020)।

प्रमुख नए प्रावधान हैं: 40 वर्ष और उससे अधिक आयु के श्रमिकों के लिए अनिवार्य वार्षिक स्वास्थ्य जांच; समान कार्य के लिए महिलाओं को समान वेतन की गारंटी; और सभी श्रमिकों को नियोक्ताओं द्वारा औपचारिक नियुक्ति पत्र देना कानूनी रूप से अनिवार्य करना। ये उपाय श्रमिकों के कल्याण को बेहतर बनाने और उद्योगों में रोजगार संबंधों को औपचारिक रूप देने के लिए हैं।

यह संशोधन विवाद समाधान तंत्र को मजबूत करता है, 'उद्योग' और 'श्रमिक' की परिभाषाओं को नया रूप देता है, और हड़ताल, तालाबंदी व छंटनी से जुड़े प्रावधानों को आधुनिक बनाता है। श्रम विशेषज्ञ इसे भारत की जटिल श्रम कानून व्यवस्था को सरल बनाने और श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा करते हुए व्यापार सुगमता सुधारने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम मानते हैं।