संसद ने जन विश्वास (संशोधन प्रावधान) विधेयक, 2026 पारित कर दिया है, जिसे आमतौर पर जन विश्वास 2.0 कहा जाता है। यह व्यापार करना और जीवन जीना आसान बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है। यह विधेयक 23 मंत्रालयों के अधीन आने वाले 79 केंद्रीय अधिनियमों के कुल 784 प्रावधानों में संशोधन करता है। इनमें से 717 प्रावधानों में अब कारावास की जगह दीवानी दंड, सुधार नोटिस या न्यायनिर्णयन का रास्ता रखा गया है, यानी इन्हें अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया गया है, जबकि 67 प्रावधानों को नागरिकों का जीवन आसान बनाने के लिए संशोधित किया गया है। यह कानून जन विश्वास अधिनियम, 2023 का अगला चरण है, जिसके तहत पहले ही 42 केंद्रीय अधिनियमों के 183 प्रावधान अपराध की श्रेणी से बाहर किए जा चुके थे। मुख्य तरीकों में कारावास की जगह दीवानी दंड देना शामिल है। उदाहरण के लिए, औषधि एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940 के तहत कुछ उल्लंघन, जिन पर पहले कारावास का दंड था, अब उन पर एक लाख रुपये या जब्त वस्तुओं की कीमत का तीन गुना दीवानी दंड लगेगा। विधिक मापविज्ञान अधिनियम, 2009 जैसे कानूनों के तहत सुधार नोटिस से व्यवसायों को किसी दंडात्मक कार्रवाई से पहले अनुपालन में हुई चूक सुधारने के लिए तय समय मिलता है। विधेयक न्यायनिर्णयन अधिकारियों की नियुक्ति का भी प्रावधान करता है, जो जांच करेंगे और दंड आदेशों के विरुद्ध अपीलों की सुनवाई करने वाले अपीलीय प्राधिकारी होंगे। वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय ने जन विश्वास 2.0 को दंड और सख्ती के बजाय भरोसे पर आधारित अनुपालन की सोच की ओर एक बुनियादी बदलाव बताया है। इसके पीछे यह मान्यता है कि ज्यादातर तकनीकी उल्लंघन बिना किसी आपराधिक मंशा के होते हैं। इस सुधार से मुकदमेबाजी घटने, कारोबार पर नियमों का बेजा बोझ कम होने और उद्यमशीलता को गति मिलने की उम्मीद है, खासकर एमएसएमई के लिए, जिन पर अनुपालन का असमान बोझ पड़ता है।