प्रकाशित: 11 मार्च 2026बिज़नेस स्टैंडर्डशासन
सर्वोच्च न्यायालय ने पहली बार निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी: हरीश राणा मामले में ऐतिहासिक निर्णय
11–12 मार्च 2026 को भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने पहली बार किसी व्यक्तिगत मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी — 32 वर्षीय हरीश राणा के लिए जीवन-रक्षक उपचार वापस लेने की स्वीकृति दी, जो अगस्त 2013 में चंडीगढ़ में एक इमारत से गिरने के बाद 13 से अधिक वर्षों से स्थायी वनस्पतिक अवस्था (PVS) में थे। न्यायमूर्ति जे. बी. पारदीवाला और के. वी. विश्वनाथन की पीठ ने चिकित्सकीय सहायता से दिए जा रहे पोषण और जल-आपूर्ति (CANH) को वापस लेने की मंजूरी दी और AIIMS दिल्ली को राणा को उसके उपशामक देखभाल केंद्र में भर्ती करने का निर्देश दिया।
यह निर्णय 2018 के कॉमन कॉज बनाम भारत संघ मामले में स्थापित संवैधानिक ढांचे का पहला व्यावहारिक प्रयोग है, जिसमें एक संविधान पीठ ने 'गरिमापूर्ण मृत्यु के अधिकार' को अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार माना था। 2011 के अरुणा शानबाग मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु को सैद्धांतिक रूप से वैध माना गया था, लेकिन इसके लिए उच्च न्यायालय की अनुमति आवश्यक थी। 2023 के दिशानिर्देशों ने न्यायिक मजिस्ट्रेट की अनिवार्य उपस्थिति हटाकर प्रक्रिया को सरल बनाया था।
न्यायालय ने माना कि CANH एक 'चिकित्सा उपचार' है और चूंकि स्वास्थ्य लाभ असंभव था, इसे वापस लेना रोगी के हित में था। हरीश राणा की 24 मार्च 2026 को AIIMS दिल्ली में मृत्यु हो गई और वे न्यायालय द्वारा अनुमोदित निष्क्रिय इच्छामृत्यु पाने वाले पहले भारतीय बने। इससे भारत निष्क्रिय इच्छामृत्यु को वैध रूप से अनुमति देने वाला 82वां देश बन गया।
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किस संवैधानिक मामले ने पहले अनुच्छेद 21 के तहत 'गरिमा के साथ मरने के अधिकार' को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी?
व्याख्या · सही उत्तर Dकॉमन कॉज बनाम भारत संघ (2018) संविधान पीठ ने 'गरिमा के साथ मरने के अधिकार' को अनुच्छेद 21 के तहत एक मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी। अरुणा शानबाग मामले (2011) ने सिद्धांत रूप में निष्क्रिय इच्छामृत्यु को वैध बनाया था लेकिन उच्च न्यायालय की मंजूरी की आवश्यकता थी। हरीश राणा का फैसला इस संवैधानिक ढाँचे का पहला व्यावहारिक अनुप्रयोग है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
12 मार्च 2026 को सर्वोच्च न्यायालय ने हरीश राणा मामले में क्या ऐतिहासिक निर्णय दिया?
12 मार्च 2026 को सर्वोच्च न्यायालय ने हरीश राणा के मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी। वे 13 वर्षों से स्थायी वानस्पतिक अवस्था (PVS) में थे। यह भारत में जीवन-रक्षक प्रणाली हटाने का अदालत से मंजूर पहला मामला था और इसके साथ भारत निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति देने वाला विश्व का 82वां देश बना।
भारत में निष्क्रिय और सक्रिय इच्छामृत्यु के बीच कानूनी अंतर क्या है?
निष्क्रिय इच्छामृत्यु में वेंटिलेटर या फीडिंग ट्यूब जैसे जीवन-रक्षक उपचार बंद किए जाते हैं, जिसकी अब अदालत द्वारा मंजूर सुरक्षा उपायों के साथ अनुमति है। सक्रिय इच्छामृत्यु में सीधे घातक पदार्थ दिया जाता है और यह भारत में अभी भी अवैध है।
सर्वोच्च न्यायालय के किस निर्णय ने गरिमापूर्ण मृत्यु के अधिकार को स्थापित किया और उसने कौन-सी व्यवस्था शुरू की?
कॉमन कॉज बनाम भारत संघ (2018) के ऐतिहासिक निर्णय ने अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) के तहत 'गरिमापूर्ण मृत्यु के अधिकार' को मान्यता दी। इसने 'अग्रिम चिकित्सा निर्देश' (लिविंग विल) को भी वैध माना, जिससे व्यक्ति अपने जीवन के अंतिम चरण में चिकित्सा से जुड़ी प्राथमिकताएँ पहले से तय कर सकते हैं।
भारत में लाइफ सपोर्ट हटाने से पहले सर्वोच्च न्यायालय ने कौन-से सुरक्षा उपाय अनिवार्य किए?
सर्वोच्च न्यायालय ने तीन प्रमुख सुरक्षा उपाय अनिवार्य किए: उच्च न्यायालय की खंडपीठ की स्वीकृति, चिकित्सा बोर्ड का प्रमाणन और निकटतम संबंधी की सहमति। लाइफ सपोर्ट हटाने से पहले ये तीनों शर्तें पूरी होनी चाहिए।
हरीश राणा निर्णय RPSC परीक्षाओं में मौलिक अधिकारों के विषय से कैसे जुड़ता है?
यह निर्णय सीधे संविधान के अनुच्छेद 21 से जुड़ा है, जो जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की गारंटी देता है। यह कॉमन कॉज (2018) जैसी न्यायिक मिसालों, जैव-नैतिकता और तुलनात्मक संवैधानिक कानून से भी जुड़ता है, जो RPSC GS Paper II के आवर्ती विषय हैं।