सुप्रीम कोर्ट ने 2026 में हरीश राणा के मामले में गरिमा के साथ मृत्यु के अधिकार को लागू करते हुए एक महत्वपूर्ण संवैधानिक और स्वास्थ्य प्रशासन से जुड़ा सवाल स्पष्ट किया। हरीश राणा 32 वर्ष के थे और लगभग 13 वर्षों से स्थायी वानस्पतिक अवस्था में थे। न्यायालय ने माना कि चिकित्सकीय सहायता से दिया जाने वाला पोषण और जलयोजन भी चिकित्सा उपचार की श्रेणी में आता है। इसलिए, उचित कानूनी प्रक्रिया और चिकित्सा बोर्डों की राय के आधार पर ऐसे उपचार को वापस लिया जा सकता है। न्यायालय ने मरीज को एम्स, नई दिल्ली स्थानांतरित करने का निर्देश भी दिया।

इस निर्णय का केंद्रीय आधार अनुच्छेद 21 से जुड़ा है, जिसमें जीवन और गरिमा की संवैधानिक व्याख्या शामिल है। कॉमन कॉज निर्णय (2018) में सुप्रीम कोर्ट ने गरिमा के साथ मृत्यु और निष्क्रिय इच्छामृत्यु से जुड़े सिद्धांतों को मान्यता दी थी। हरीश राणा मामले में उन्हीं सिद्धांतों को एक वास्तविक चिकित्सा स्थिति पर लागू किया गया। न्यायालय ने एम्स, नई दिल्ली से जुड़े चिकित्सा परीक्षण और बोर्डों की राय को महत्व दिया तथा उपचार जारी रखने को मरीज के सर्वोत्तम हित की कसौटी से जोड़ा।

प्रीलिम्स में अनुच्छेद 21, गरिमा के साथ मृत्यु का अधिकार, कॉमन कॉज निर्णय और चिकित्सकीय सहायता से पोषण तथा जलयोजन जैसे तथ्य पूछे जा सकते हैं। मुख्य परीक्षा में यह मामला व्यक्ति की गरिमा, कानूनी प्रक्रिया, चिकित्सा बोर्डों की भूमिका और उपचार वापस लेने से जुड़े सुरक्षा उपायों को समझाने में उपयोगी है। RAS और UPSC दोनों में इसे समसामयिकी को स्टैटिक जीके से जोड़कर पढ़ना चाहिए।