प्रकाशित: 11 मार्च 2026टॉपिक
सुप्रीम कोर्ट ने गरिमामय मृत्यु के अधिकार को बरकरार रखा; हरीश राणा के लिए कृत्रिम पोषण और जलयोजन हटाने की अनुमति
सुप्रीम कोर्ट ने 2026 में हरीश राणा के मामले में गरिमा के साथ मृत्यु के अधिकार को लागू करते हुए एक महत्वपूर्ण संवैधानिक और स्वास्थ्य प्रशासन से जुड़ा सवाल स्पष्ट किया। हरीश राणा 32 वर्ष के थे और लगभग 13 वर्षों से स्थायी वानस्पतिक अवस्था में थे। न्यायालय ने माना कि चिकित्सकीय सहायता से दिया जाने वाला पोषण और जलयोजन भी चिकित्सा उपचार की श्रेणी में आता है। इसलिए, उचित कानूनी प्रक्रिया और चिकित्सा बोर्डों की राय के आधार पर ऐसे उपचार को वापस लिया जा सकता है। न्यायालय ने मरीज को एम्स, नई दिल्ली स्थानांतरित करने का निर्देश भी दिया।
इस निर्णय का केंद्रीय आधार अनुच्छेद 21 से जुड़ा है, जिसमें जीवन और गरिमा की संवैधानिक व्याख्या शामिल है। कॉमन कॉज निर्णय (2018) में सुप्रीम कोर्ट ने गरिमा के साथ मृत्यु और निष्क्रिय इच्छामृत्यु से जुड़े सिद्धांतों को मान्यता दी थी। हरीश राणा मामले में उन्हीं सिद्धांतों को एक वास्तविक चिकित्सा स्थिति पर लागू किया गया। न्यायालय ने एम्स, नई दिल्ली से जुड़े चिकित्सा परीक्षण और बोर्डों की राय को महत्व दिया तथा उपचार जारी रखने को मरीज के सर्वोत्तम हित की कसौटी से जोड़ा।
प्रीलिम्स में अनुच्छेद 21, गरिमा के साथ मृत्यु का अधिकार, कॉमन कॉज निर्णय और चिकित्सकीय सहायता से पोषण तथा जलयोजन जैसे तथ्य पूछे जा सकते हैं। मुख्य परीक्षा में यह मामला व्यक्ति की गरिमा, कानूनी प्रक्रिया, चिकित्सा बोर्डों की भूमिका और उपचार वापस लेने से जुड़े सुरक्षा उपायों को समझाने में उपयोगी है। RAS और UPSC दोनों में इसे समसामयिकी को स्टैटिक जीके से जोड़कर पढ़ना चाहिए।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
हरीश राणा मामले में सुप्रीम कोर्ट ने क्या निर्णय दिया?
सुप्रीम कोर्ट ने गरिमा के साथ मृत्यु के अधिकार को लागू किया और माना कि चिकित्सकीय सहायता से दिया जाने वाला पोषण और जलयोजन चिकित्सा उपचार है। चिकित्सा बोर्डों की राय और उचित प्रक्रिया के आधार पर इसे वापस लेने की अनुमति दी गई।
चिकित्सकीय सहायता से पोषण और जलयोजन क्या है?
यह ऐसी चिकित्सा व्यवस्था है जिसमें मरीज को कृत्रिम तरीके से पोषण और तरल पदार्थ दिए जाते हैं। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने इसे चिकित्सा उपचार माना, इसलिए उचित कानूनी प्रक्रिया में इसे वापस लिया जा सकता है।
गरिमा के साथ मृत्यु के अधिकार का संवैधानिक आधार क्या है?
यह अधिकार अनुच्छेद 21 की जीवन और गरिमा से जुड़ी व्याख्या से निकलता है। कॉमन कॉज निर्णय (2018) ने इस सिद्धांत और निष्क्रिय इच्छामृत्यु की प्रक्रिया को महत्वपूर्ण आधार दिया।
परीक्षा की दृष्टि से यह मामला क्यों महत्वपूर्ण है?
यह मामला मौलिक अधिकार, अनुच्छेद 21, न्यायपालिका की भूमिका, स्वास्थ्य प्रशासन और गरिमा से जुड़े अधिकारों को जोड़ता है। RAS और UPSC में इससे प्रीलिम्स के तथ्य और मुख्य परीक्षा के विश्लेषणात्मक प्रश्न दोनों बन सकते हैं।