सुप्रीम कोर्ट ने 32 वर्षीय हरीश राणा के मामले में गरिमा के साथ मृत्यु के अधिकार को बरकरार रखा। हरीश राणा लगभग 13 वर्षों से स्थायी वनस्पति अवस्था में थे। कोर्ट ने चिकित्सकीय सहायता से दिए जा रहे पोषण और जल को वापस लेने की अनुमति दी और उन्हें एम्स (दिल्ली) में स्थानांतरित करने का निर्देश दिया।

यह संविधान और शासन व्यवस्था की दृष्टि से इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि गरिमा के साथ मृत्यु का अधिकार अनुच्छेद 21 में निहित जीवन और गरिमा के अधिकार से जुड़ता है। कॉमन कॉज मामले, 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने इस सिद्धांत को मान्यता दी थी। हरीश राणा मामले में वही संवैधानिक सोच ऐसे रोगी की स्थिति में लागू हुई जो लंबे समय से स्वतंत्र रूप से भोजन या जल ग्रहण करने की अवस्था में नहीं था। इसे मौलिक अधिकारों और समसामयिकी, दोनों हिस्सों में पढ़ना उपयोगी है।

परीक्षा में इससे मौलिक अधिकार, न्यायिक व्याख्या, चिकित्सा नैतिकता और स्वास्थ्य सेवाओं की व्यवस्था पर प्रश्न बन सकते हैं। प्रारंभिक परीक्षा में अनुच्छेद 21, कॉमन कॉज निर्णय, स्थायी वनस्पति अवस्था और चिकित्सकीय सहायता से पोषण-जल रोकने जैसे तथ्य पूछे जा सकते हैं। मुख्य परीक्षा में यह प्रश्न जीवन के अधिकार की सीमा, व्यक्ति की गरिमा, डॉक्टरों की भूमिका, तथा चिकित्सा बोर्ड के निर्णय जैसे पक्षों से जुड़ सकता है। इसलिए इस मामले को केवल स्वास्थ्य क्षेत्र की खबर की तरह नहीं, बल्कि संविधान और शासन के उदाहरण के रूप में पढ़ना चाहिए।