सुप्रीम कोर्ट ने 13 साल कोमा में रहे हरीश राणा के लिए भारत की पहली निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी
Aसीधा उत्तर
SC ने 13 साल से कोमा में रहे हरीश राणा के लिए भारत में पहली बार निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी; अनुच्छेद 21 से जुड़ा ऐतिहासिक फैसला।
मुख्य तथ्य
सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने 11 मार्च 2026 को 32 वर्षीय हरीश राणा की जीवन-रक्षक प्रणाली हटाने की अनुमति दी। वह 2013 से वानस्पतिक अवस्था में थे।
वर्ष 2018 के कॉमन कॉज निर्णय में इस अधिकार को मान्यता मिलने के बाद, यह भारत में निष्क्रिय इच्छामृत्यु का पहला न्यायालय-अनुमोदित मामला है।
भारत की कानूनी व्यवस्था सक्रिय इच्छामृत्यु, जो अवैध है, और निष्क्रिय इच्छामृत्यु, जो 2018 से दिशानिर्देशों के तहत कानूनी है, के बीच भेद करती है।
प्रमुख पड़ावों में अरुणा शानबाग मामला (2011), जिसमें निष्क्रिय इच्छामृत्यु को पहली बार वैध ठहराया गया; कॉमन कॉज मामला (2018), जिसमें गरिमापूर्ण मृत्यु के अधिकार और अग्रिम चिकित्सा निर्देशों को मान्यता दी गई; तथा 2023 के दिशानिर्देश, जिन्होंने प्रक्रिया सरल बनाई, शामिल हैं।
हरीश राणा को AIIMS की उपशामक देखभाल इकाई में स्थानांतरित किया गया।
सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने 11 मार्च 2026 को हरीश राणा (32) की जीवन-रक्षक प्रणाली हटाने की अनुमति दी। उत्तर प्रदेश के निवासी हरीश 2013 में एक इमारत से गिरने के बाद से वानस्पतिक अवस्था में हैं। वर्ष 2018 के कॉमन कॉज निर्णय में इस अधिकार को मान्यता मिलने के बाद, यह भारत में निष्क्रिय इच्छामृत्यु का पहला न्यायालय-अनुमोदित मामला है।
भारत की कानूनी व्यवस्था में सक्रिय इच्छामृत्यु अवैध है, जबकि निष्क्रिय इच्छामृत्यु 2018 से दिशानिर्देशों के तहत कानूनी है। अरुणा शानबाग मामला (2011) में निष्क्रिय इच्छामृत्यु को पहली बार वैध ठहराया गया; कॉमन कॉज मामला (2018) में गरिमापूर्ण मृत्यु के अधिकार और अग्रिम चिकित्सा निर्देशों को मान्यता दी गई; और 2023 के दिशानिर्देशों ने प्रक्रिया सरल बनाई। हरीश को AIIMS की उपशामक देखभाल इकाई में स्थानांतरित किया गया।
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मेन्स दृष्टिकोण
प्रश्न: अनुच्छेद 21 के संदर्भ में 11 मार्च 2026 को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा हरीश राणा के लिए भारत की पहली निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति के आदेश का विश्लेषण कीजिए।
उत्तर (50 शब्द):
11 मार्च 2026 को सर्वोच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति पारदीवाला एवं विश्वनाथन पीठ ने 32-वर्षीय हरीश राणा, 2013 से वानस्पतिक अवस्था में, के लिए जीवन-रक्षक प्रणाली हटाने की अनुमति दी — 2018 कॉमन कॉज निर्णय, जिसने अनुच्छेद 21 के अंतर्गत सम्मानपूर्वक मरने का अधिकार दिया, के बाद भारत की पहली न्यायालय-स्वीकृत निष्क्रिय इच्छामृत्यु।
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भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने किस ऐतिहासिक मामले में पहली बार निष्क्रिय इच्छामृत्यु को वैध किया?
व्याख्या · सही उत्तर B
अरुणा शानबाग मामले (2011) में भारत में पहली बार निष्क्रिय इच्छामृत्यु को वैध किया गया। कॉमन कॉज फैसले (2018) ने गरिमा से मृत्यु के अधिकार को मान्यता दी। हरीश राणा (2026) 2018 ढाँचे के तहत निष्क्रिय इच्छामृत्यु का पहला न्यायालय-अनुमोदित मामला बना।
भारत में निष्क्रिय इच्छामृत्यु का पहला न्यायालय-अनुमोदित मामला कौन-सा था?
**11 मार्च 2026** को **सर्वोच्च न्यायालय** ने **हरीश राणा (32)** की जीवन-रक्षक प्रणाली हटाने की अनुमति दी। उत्तर प्रदेश के निवासी हरीश 2013 में एक इमारत से गिरने के बाद से **वानस्पतिक अवस्था** में थे। वर्ष **2018 के कॉमन कॉज निर्णय** में इस अधिकार को मान्यता मिलने के बाद, यह **भारत में निष्क्रिय इच्छामृत्यु का पहला न्यायालय-अनुमोदित मामला** था। पीठ में न्यायमूर्ति **जे.बी. पारदीवाला और के.वी. विश्वनाथन** शामिल थे।
भारतीय कानून में सक्रिय और निष्क्रिय इच्छामृत्यु में क्या अंतर है?
भारतीय कानून में किसी घातक पदार्थ का प्रयोग करके जानबूझकर जीवन समाप्त करने वाली **सक्रिय इच्छामृत्यु अवैध** है। जीवन बनाए रखने वाला उपचार हटाने की प्रक्रिया को **निष्क्रिय इच्छामृत्यु** कहते हैं, जो **2018 से दिशानिर्देशों के तहत कानूनी** है। इस अधिकार को पहली बार **अरुणा शानबाग मामला (2011)** में मान्यता मिली थी। **कॉमन कॉज मामला (2018)** ने गरिमापूर्ण मृत्यु के अधिकार और **अग्रिम चिकित्सा निर्देशों** को मान्यता दी।
कॉमन कॉज मामला (2018) का निर्णय क्या था और इसका 2026 के हरीश राणा मामले से क्या संबंध है?
**कॉमन कॉज मामला (2018)** ने **गरिमापूर्ण मृत्यु के अधिकार** को मान्यता दी और दिशानिर्देशों के तहत भारत में **अग्रिम चिकित्सा निर्देशों** तथा **निष्क्रिय इच्छामृत्यु** को वैध ठहराया। इसी कानूनी ढाँचे के तहत **हरीश राणा मामला (11 मार्च 2026)** निष्क्रिय इच्छामृत्यु का पहला न्यायालय-अनुमोदित मामला था। सर्वोच्च न्यायालय ने 2013 से वानस्पतिक अवस्था में रहे राणा की जीवन-रक्षक प्रणाली हटाने की अनुमति दी।
अग्रिम चिकित्सा निर्देश क्या हैं और भारत में इन्हें कब मान्यता मिली?
**अग्रिम चिकित्सा निर्देश** ऐसे कानूनी दस्तावेज़ हैं जिनमें कोई व्यक्ति यह बताता है कि निर्णय लेने में असमर्थ होने पर वह अपने लिए किस प्रकार का चिकित्सा उपचार चाहता है। भारत में **सर्वोच्च न्यायालय** ने **कॉमन कॉज मामला (2018)** में इन्हें मान्यता दी। वर्ष 2023 में इनकी प्रक्रिया सरल बनाई गई। इसी कानूनी ढाँचे के तहत **हरीश राणा मामला (मार्च 2026)** निष्क्रिय इच्छामृत्यु का भारत का पहला न्यायालय-अनुमोदित मामला था।
हरीश राणा के 2026 के मामले तक भारत में निष्क्रिय इच्छामृत्यु कानून के प्रमुख पड़ाव कौन-से थे?
भारत में निष्क्रिय इच्छामृत्यु से जुड़े प्रमुख पड़ाव हैं: **अरुणा शानबाग मामला (2011)**, जिसमें निष्क्रिय इच्छामृत्यु को पहली बार वैध ठहराया गया; **कॉमन कॉज मामला (2018)**, जिसमें गरिमापूर्ण मृत्यु के अधिकार और अग्रिम चिकित्सा निर्देशों को मान्यता दी गई; तथा **2023 के दिशानिर्देश**, जिन्होंने प्रक्रिया सरल बनाई। इसके बाद **11 मार्च 2026** को सर्वोच्च न्यायालय ने हरीश राणा की जीवन-रक्षक प्रणाली हटाने की अनुमति दी। यह भारत में निष्क्रिय इच्छामृत्यु का पहला न्यायालय-अनुमोदित मामला था।
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