संसद की प्रवर समिति ने दिवालिया एवं ऋणशोधन अक्षमता संहिता (संशोधन) विधेयक 2025 की समीक्षा के बाद अपनी व्यापक रिपोर्ट सौंपी है, जिसमें IBC ढांचे में 70 से अधिक संशोधन प्रस्तावित हैं। यह 2019 के बाद संहिता का पहला प्रमुख संशोधन है। PRS लेजिस्लेटिव रिसर्च द्वारा विश्लेषित इस रिपोर्ट में भारत की दिवालिया समाधान संरचना में कई संरचनात्मक सुधारों का प्रस्ताव है।

प्रमुख सुधारों में शामिल हैं: (1) लेनदारों द्वारा शुरू की जाने वाली दिवालियेपन की कार्यवाही, जिससे वित्तीय लेनदार CIRP अधिक कुशलता से शुरू कर सकते हैं; (2) समूह दिवालियेपन का ढांचा, जो एक ही कॉर्पोरेट समूह की संबंधित कंपनियों के समन्वित समाधान में मदद करता है; (3) सीमा-पार दिवालियेपन से जुड़े प्रावधान, जो UNCITRAL मॉडल कानून के अनुरूप हैं।

IBC को मूलतः 2016 में कंपनियों की दिवालिया संबंधी कानूनों को समेकित करने के लिए अधिनियमित किया गया था। समाधान दर और समय-सीमा पर बहस होती रही है — औसत समाधान अवधि कई मामलों में 600 दिनों से अधिक हो गई है, जबकि मूल परिकल्पना 270 दिनों की थी। 2025 के संशोधनों का उद्देश्य संचालन की दक्षता सुधारना, न्यायिक व्याख्या से जुड़ी कमियों को दूर करना और भारत को वैश्विक दिवालियेपन मानकों के अनुरूप लाना है। UNCITRAL मॉडल कानून के अनुरूप होना विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे भारत ऐसे FDI-अनुकूल गंतव्य के रूप में स्थापित होता है, जहाँ सीमा-पार दिवालियेपन के नियमों का पहले से अंदाज़ा लगाया जा सकता है।