राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में 24 न्यायाधीशों की नियुक्ति की। इन नियुक्तियों में वरिष्ठ अधिवक्ता विवेक सरन, गरिमा प्रशाद और सुधांशु चौहान जैसे नाम शामिल हैं। इसी क्रम में हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय में 2 न्यायाधीशों की नियुक्ति हुई और कर्नाटक उच्च न्यायालय में भी न्यायिक नियुक्तियाँ की गईं। 2025 की इस खबर का मुख्य संदर्भ भारतीय न्यायालयों में लंबित मामलों की बड़ी संख्या है, क्योंकि न्यायाधीशों के रिक्त पद भरना न्याय वितरण की गति से सीधे जुड़ा विषय है।

परीक्षा के लिहाज से यह मुद्दा भारतीय संविधान और शासन व्यवस्था, दोनों से जुड़ता है। उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति संविधान के अनुच्छेद 217 के तहत राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। इस प्रक्रिया में सर्वोच्च न्यायालय कॉलेजियम की सिफारिशों के आधार पर संबंधित राज्य के राज्यपाल और उस उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श भी एक अहम हिस्सा है। इसलिए यह विषय केवल समसामयिकी की एक नियुक्ति-सूचना नहीं, बल्कि संवैधानिक पदों, न्यायपालिका की स्वतंत्रता, न्यायिक प्रशासन और लंबित मामलों की समस्या को समझने का आधार भी है।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय का संदर्भ विशेष महत्त्व रखता है, क्योंकि यह भारत के सबसे बड़े उच्च न्यायालयों में से एक है और लंबित मामलों की दृष्टि से सबसे अधिक बोझ वाले न्यायालयों में गिना जाता है। ऐसे में 24 न्यायाधीशों की नियुक्ति को न्यायिक क्षमता बढ़ाने और मामलों के निस्तारण की प्रक्रिया को मज़बूत करने के प्रयास के रूप में देखा जा सकता है। RAS और UPSC जैसी परीक्षाओं में इससे जुड़े प्रश्न नियुक्ति करने वाले प्राधिकारी, अनुच्छेद 217, कॉलेजियम प्रक्रिया, संबंधित उच्च न्यायालयों, नियुक्त व्यक्तियों के नाम और लंबित मामलों के शासन पर प्रभाव जैसे पहलुओं से जुड़े हो सकते हैं।