भारत ने जनवरी 2026 की शुरुआत में हरित बुनियादी ढाँचे के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की — वह दुनिया का पहला देश बना, जिसने कृषि अपशिष्ट से व्यावसायिक स्तर पर बायो-बिटुमेन का उत्पादन किया। बायो-बिटुमेन पेट्रोलियम-आधारित बिटुमेन का एक टिकाऊ विकल्प है — यह सड़क निर्माण, हवाई अड्डे की रनवे और डामर सतहों में इस्तेमाल होने वाली पारंपरिक बाइंडिंग सामग्री है। भारत PM गति शक्ति, भारतमाला परियोजना और PMGSY जैसे प्रमुख कार्यक्रमों के तहत सड़क निर्माण के लिए प्रतिवर्ष लगभग 90 लाख टन बिटुमेन का उपयोग करता है। बायो-बिटुमेन तकनीक में धान के पुआल, गेहूँ के भूसे, गन्ने की खोई और अन्य फसल अवशेषों का उपयोग होता है। तापरासायनिक रूपांतरण प्रक्रिया (पायरोलिसिस और हाइड्रोट्रीटमेंट) से कृषि अपशिष्ट को बायो-ऑयल में बदला जाता है, जिसे फिर पारंपरिक बिटुमेन ग्रेड के बराबर बाइंडर के रूप में तैयार किया जाता है। राजस्थान के लिए — जहाँ महत्वपूर्ण कृषि गतिविधि (गेहूँ, बाजरा, सरसों, कपास), सड़क निर्माण की बड़ी आवश्यकताएँ और सीमावर्ती जिलों में फसल अवशेष जलाने की समस्या है — बायो-बिटुमेन आर्थिक और पर्यावरणीय, दोनों तरह के लाभ दे सकता है।