भारत के रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) ने 11 जनवरी 2026 को ओडिशा के चांदीपुर स्थित एकीकृत परीक्षण रेंज (ITR) में स्वदेश में विकसित प्रलय अर्ध-बैलिस्टिक सतह-से-सतह मिसाइल का साल्वो परीक्षण सफलतापूर्वक किया। परीक्षण के दौरान एक ही प्रक्षेपक से कम अंतराल में एक के बाद एक दो प्रलय मिसाइलें दागी गईं। यह क्षमता आधुनिक युद्धक्षेत्र में एक महत्वपूर्ण सामरिक आवश्यकता है।

प्रलय मिसाइल ठोस ईंधन से चलती है और इसकी प्रमाणित मारक दूरी 350–500 किमी है। इसलिए यह शत्रु के क्षेत्र में भीतर तक स्थित ठिकानों पर हमला कर सकती है। यह लगभग 1 टन भार वहन कर सकती है, जो पारंपरिक उच्च-विस्फोटक और भविष्य में संभावित सटीक-प्रहार वाले आयुध विन्यासों के लिए पर्याप्त है। मिसाइल उन्नत जड़त्वीय दिशा-निर्देशन प्रणाली का उपयोग करती है और उड़ान के बीच में मार्ग सुधार सकती है। इससे यह स्थिर और अर्ध-स्थिर लक्ष्यों पर अधिक सटीक प्रहार कर सकती है।

साल्वो प्रक्षेपण की क्षमता, यानी एक ही प्रक्षेपक से कम समय में लगातार दो मिसाइलें दागना, रणनीतिक रूप से खास महत्व रखती है। युद्धक्षेत्र में इससे दुश्मन की वायु रक्षा प्रणालियों पर एक साथ दबाव पड़ता है और अधिक खतरे वाली परिस्थिति में भी कम से कम एक मिसाइल के लक्ष्य तक पहुंचने की संभावना बढ़ जाती है। परीक्षण की निगरानी DRDO के वैज्ञानिकों, रक्षा मंत्रालय के अधिकारियों और भारतीय सेना के वरिष्ठ सैन्य कर्मियों ने की।

प्रलय मिसाइल प्रणाली को निकट भविष्य में भारतीय सेना में शामिल किए जाने की उम्मीद है। इससे भारतीय सेना की सतह-से-सतह मारक क्षमता बढ़ेगी। ऐसी क्षमता चीन की जनमुक्ति सेना के रॉकेट बल और पाकिस्तान के सामरिक बैलिस्टिक मिसाइल शस्त्रागार में पहले से मौजूद है। प्रलय को शामिल किए जाने से भारत की उत्तरी और पश्चिमी, दोनों सीमाओं पर उसकी प्रतिरोधक क्षमता काफी बढ़ेगी।

यह परीक्षण आत्मनिर्भर भारत पहल के तहत रक्षा उत्पादन को स्वदेशी बनाने की DRDO की व्यापक पहल का हिस्सा है। इससे आयातित मिसाइल प्रणालियों पर भारत की निर्भरता घटेगी और देश के रक्षा उद्योग की क्षमता बढ़ेगी।