31 जनवरी 2026 तक भारत की कुल स्थापित विद्युत उत्पादन क्षमता 520.511 गीगावाट थी। इसमें 271.969 गीगावाट, यानी 52.3%, क्षमता गैर-जीवाश्म ईंधन स्रोतों से थी। इसका अर्थ है कि भारत के बिजली क्षेत्र में कोयला और अन्य जीवाश्म स्रोतों के साथ-साथ स्वच्छ ऊर्जा की हिस्सेदारी अब निर्णायक स्तर पर पहुंच चुकी है। परीक्षा की दृष्टि से यह तथ्य ऊर्जा सुरक्षा, जलवायु नीति और आर्थिक विकास को स्पष्ट रूप से जोड़ता है, इसलिए इसे केवल एक आंकड़ा मानकर नहीं पढ़ना चाहिए।

भारत ने 2025 में स्थापित विद्युत क्षमता में 50% गैर-जीवाश्म हिस्सेदारी का मुकाम हासिल किया था। यह लक्ष्य पेरिस समझौते के तहत भारत के राष्ट्रीय निर्धारित योगदान और ग्लासगो जलवायु सम्मेलन में घोषित पंचामृत प्रतिबद्धता से जुड़ा था, जिसमें 2030 तक 50% स्थापित विद्युत क्षमता गैर-जीवाश्म स्रोतों से करने की बात थी। भारत ने यह लक्ष्य तय समय से पांच वर्ष पहले पूरा किया। प्रारंभिक परीक्षा में 520.511 गीगावाट कुल क्षमता, 271.969 गीगावाट गैर-जीवाश्म क्षमता, 52.3% हिस्सेदारी, 2025 की उपलब्धि और 2030 लक्ष्य जैसे सीधे तथ्य पूछे जा सकते हैं।

मुख्य परीक्षा के लिए इसका महत्व नीति और शासन से जुड़ता है। गैर-जीवाश्म क्षमता बढ़ना जलवायु प्रतिबद्धताओं, ऊर्जा संक्रमण, निवेश प्राथमिकताओं और बिजली क्षेत्र की दीर्घकालिक योजना को दिखाता है। आर्थिक विषय में यह बिजली अवसंरचना और विकास क्षमता से जुड़ा है, जबकि पर्यावरण विषय में यह उत्सर्जन घटाने और पेरिस समझौते की जवाबदेही से संबंधित है। RAS और UPSC जैसी परीक्षाओं में इसे समसामयिकी, स्टैटिक जीके, जलवायु नीति और आर्थिक विकास के संयुक्त विषय के रूप में पढ़ना उपयोगी है।