20 नवंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने T.N. गोदावर्मन थिरुमुलपाद बनाम भारत संघ मामले में एक महत्वपूर्ण आदेश पारित किया। न्यायालय ने अरावली पहाड़ियों और श्रेणियों की परिभाषा पर न्यायालय-नियुक्त समिति की सिफारिशें स्वीकार कीं। नई परिभाषा के अनुसार, 'अरावली जिलों में स्थित कोई भी भू-आकृति जिसकी स्थानीय धरातल से सापेक्ष ऊंचाई 100 मीटर या अधिक हो' अरावली पहाड़ी मानी जाएगी; एक-दूसरे से 500 मीटर के दायरे में ऐसी दो या अधिक पहाड़ियाँ 'अरावली श्रेणी' बनाएँगी। न्यायालय ने MPSM तैयार होने तक नए खनन पट्टों पर अंतरिम रोक लगाई। अरावली पर्वत श्रृंखला — पृथ्वी की सबसे प्राचीन भूवैज्ञानिक संरचनाओं में से एक — गुजरात से दिल्ली तक लगभग 692 किमी तक फैली है, जिसका सबसे बड़ा हिस्सा राजस्थान में है। राजस्थान की अरावली पट्टी सिरोही, उदयपुर, राजसमंद, अजमेर, अलवर, झुंझुनू जिलों में है और भूजल पुनर्भरण, जैव विविधता तथा थार मरुस्थल के विस्तार को रोकने के लिए महत्वपूर्ण है। ध्यातव्य: सुप्रीम कोर्ट ने बाद में (29 दिसंबर 2025) पारिस्थितिक संरक्षण कमजोर होने की चिंताओं के बीच इस आदेश को स्थगित कर दिया।
अरावली पहाड़ियों पर सुप्रीम कोर्ट का 20 नवंबर आदेश: नई परिभाषा, खनन पर रोक और संरक्षण ढाँचा
20 नवंबर 2025 को, सुप्रीम कोर्ट ने T.N. गोदावर्मन थिरुमुलपाद बनाम भारत संघ मामले में एक महत्वपूर्ण आदेश पारित किया। न्यायालय ने अरावली पहाड़ियों और श्रेणियों की परिभाषा पर न्यायालय-नियुक्त समिति की सिफारिशें स्वीकार कीं। नई परिभाषा के अनुसार, 'अरावली जिलों में स्थित कोई भी भू-आकृति, जिसकी ऊँचाई स्थानीय धरातल से 100 मीटर या अधिक हो', अरावली पहाड़ी है; एक-दूसरे से 500 मीटर के दायरे में दो या अधिक ऐसी पहाड़ियाँ 'अरावली श्रेणी' बनाती हैं। न्यायालय ने MPSM तैयार होने तक नए खनन पट्टों पर अंतरिम रोक लगाई। अरावली पर्वत श्रृंखला — विश्व की प्राचीनतम मुड़ी हुई पर्वत श्रृंखला (~350 करोड़ वर्ष पुरानी) — गुजरात से दिल्ली तक लगभग 692 किमी में फैली है, जिसका सबसे बड़ा हिस्सा राजस्थान में है। राजस्थान की अरावली पट्टी सिरोही, उदयपुर, राजसमंद, अजमेर, अलवर, झुंझुनू जिलों में है और भूजल पुनर्भरण, जैव विविधता और थार मरुस्थल विस्तार रोकने के लिए महत्वपूर्ण है। ध्यातव्य: सुप्रीम कोर्ट ने बाद में (29 दिसंबर 2025) इस आदेश को पारिस्थितिक संरक्षण कमजोर होने की चिंताओं के बीच स्थगित कर दिया।
मुख्य तथ्य
- सुप्रीम कोर्ट ने 20 नवंबर 2025 को अरावली पहाड़ियों की परिभाषा पर ऐतिहासिक आदेश पारित किया।
- अरावली जिलों में 100+ मीटर ऊंचाई वाली कोई भी भू-आकृति अरावली पहाड़ी मानी जाएगी।
- MPSM तैयार होने तक नए खनन पट्टों पर अंतरिम रोक लगाई गई।
- अरावली लगभग 350 करोड़ वर्ष पुरानी विश्व की प्राचीनतम मुड़ी हुई पर्वत श्रृंखला है।
- यह श्रृंखला गुजरात से दिल्ली तक 692 किमी फैली है; इसका सबसे बड़ा हिस्सा राजस्थान में है।
- सुप्रीम कोर्ट ने बाद में पारिस्थितिक चिंताओं को देखते हुए 29 दिसंबर 2025 को इस आदेश पर रोक लगा दी।
मेन्स दृष्टिकोण
प्रश्न: 20 नवंबर 2025 के सर्वोच्च न्यायालय के अरावली आदेश—नई परिभाषा, खनन रोक एवं बाद के स्थगन—तथा राजस्थान एवं हरियाणा में पारिस्थितिक संरक्षण के लिए इसके निहितार्थों का मूल्यांकन कीजिए।
उत्तर (50 शब्द):
20 नवंबर 2025 को सर्वोच्च न्यायालय ने टी.एन. गोदावर्मन मामले में अरावली की नई परिभाषा अपनाई—अरावली जिलों में स्थानीय भू-उच्चता से 100 मीटर ऊपर स्थित भू-आकृतियाँ और 500 मीटर के भीतर आने वाले समूह इसमें रखे गए—तथा सतत खनन प्रबंधन योजना लंबित रहने तक नए खनन पट्टों पर अंतरिम रोक लगाई; 29 दिसंबर 2025 को स्थगित।
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अरावली पहाड़ियां विश्व की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखलाओं में से एक हैं। इनकी सबसे ऊंची चोटी कौन-सी है?
माउंट आबू पर 1,722 मीटर पर गुरु शिखर अरावली श्रृंखला की सबसे ऊंची चोटी है।
स्रोत: PIB
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
सुप्रीम कोर्ट ने 20 नवंबर 2025 के आदेश में अरावली पहाड़ियों की क्या नई परिभाषा अपनाई?
सुप्रीम कोर्ट ने न्यायालय-नियुक्त समिति की परिभाषा स्वीकार की: अरावली जिलों में स्थित कोई भी भू-आकृति, जिसकी ऊंचाई स्थानीय भू-उभार से 100 मीटर या अधिक हो, 'अरावली पहाड़ी' मानी जाएगी। एक-दूसरे से 500 मीटर के दायरे में दो या अधिक ऐसी पहाड़ियाँ मिलकर 'अरावली श्रेणी' बनाती हैं। इस वैज्ञानिक परिभाषा से वन संरक्षण और खनन विनियमन पर सीधा असर पड़ता है।
MPSM क्या है और सुप्रीम कोर्ट ने अरावली में नए खनन पट्टों पर अंतरिम रोक क्यों लगाई?
MPSM का अर्थ है सतत खनन प्रबंधन योजना — अरावली क्षेत्र में नए खनन पट्टे देने से पहले यह व्यापक पर्यावरणीय ढाँचा तैयार होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने MPSM तैयार होने तक नए पट्टों पर रोक लगाई, ताकि नियामक ढाँचा अंतिम रूप लेने तक अरावली के पारिस्थितिकी तंत्र को अपूरणीय क्षति से बचाया जा सके।
अरावली श्रृंखला का भूवैज्ञानिक महत्व क्या है?
अरावली पृथ्वी की सबसे प्राचीन भूवैज्ञानिक संरचनाओं में से एक है। यह गुजरात से दिल्ली तक 692 किमी तक फैली है और इसका सबसे बड़ा हिस्सा राजस्थान में पड़ता है। भूवैज्ञानिक रूप से ये प्री-कैम्ब्रियन रूपांतरित चट्टानें हैं। यह श्रृंखला बनास, लूणी और साबरमती जैसी नदियों के लिए महत्वपूर्ण जल-विभाजक का काम करती है।
20 नवंबर 2025 का अरावली आदेश किस सुप्रीम कोर्ट मामले में पारित हुआ और 29 दिसंबर 2025 का क्या महत्व था?
यह आदेश T.N. गोदावर्मन थिरुमुलपाद बनाम भारत संघ मामले में पारित हुआ। यह वन संरक्षण से जुड़ा ऐतिहासिक मामला है, जो 1995 से चल रहा है। 29 दिसंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने पारिस्थितिक और प्रक्रियागत चिंताओं को देखते हुए अपने ही 20 नवंबर के आदेश पर रोक लगा दी, इसलिए यह RPSC करेंट अफेयर्स के लिए अब भी प्रासंगिक कानूनी मामला बना हुआ है।
अरावली श्रृंखला राजस्थान और व्यापक क्षेत्र के लिए पारिस्थितिक रूप से इतनी महत्वपूर्ण क्यों है?
अरावली थार रेगिस्तान के पूर्व की ओर फैलाव को रोकने वाली प्राकृतिक बाधा के रूप में काम करती है, जिससे राजस्थान और हरियाणा के उपजाऊ मैदानों की रक्षा होती है। यह भूजल पुनर्भरण का महत्वपूर्ण क्षेत्र, तेंदुए और प्रवासी पक्षियों का आवास और कार्बन अवशोषण का स्रोत है। अनियंत्रित खनन पहले से ही जल-संकटग्रस्त क्षेत्र में मरुस्थलीकरण और भूजल ह्रास को तेज कर सकता है।
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