टाटा स्टील ने 21 अप्रैल 2026 को घोषणा की थी और 23 अप्रैल 2026 तक यह खबर व्यापक रूप से प्रकाशित हो चुकी थी कि उसने झारखंड के जमशेदपुर वर्क्स में औद्योगिक स्तर पर दुनिया की पहली EASyMelt (विद्युत-सहायित सिनगैस स्मेल्टर) डीकार्बनाइज़ेशन तकनीक लगाने के लिए लक्ज़मबर्ग की पॉल वुर्थ, एस.ए., जो SMS ग्रुप GmbH का हिस्सा है, के साथ अंतिम समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं। इसका पहला उपयोग कंपनी की 649 घन मीटर आयतन वाली 'E' ब्लास्ट फर्नेस इकाई में किया जाएगा। परियोजना का लक्ष्य मौजूदा ब्लास्ट फर्नेस संचालन की तुलना में CO2 उत्सर्जन में 50 प्रतिशत से अधिक कमी लाना है। EASyMelt लोहा बनाने में अपचायक के रूप में इस्तेमाल होने वाले धातुकर्म कोक के एक बड़े हिस्से की जगह सिनगैस का उपयोग करती है। यह सिनगैस टॉप-गैस के पुनर्चक्रण और कोक-ओवन गैस जैसी हाइड्रोकार्बन-समृद्ध गैसों की रिफॉर्मिंग से तैयार होती है। इस व्यवस्था में स्थानीय उपलब्धता के अनुसार प्राकृतिक गैस, हाइड्रोजन, अमोनिया या बिजली का इस्तेमाल किया जा सकता है। इसलिए यह भारत में ऊर्जा बदलाव के उस रास्ते के लिए खास तौर पर उपयोगी है, जिसमें मौजूदा जीवाश्म ईंधन और ग्रिड बिजली के साथ हरित हाइड्रोजन का इस्तेमाल धीरे-धीरे बढ़ाया जाना है। टाटा स्टील के मुख्य कार्यकारी अधिकारी एवं प्रबंध निदेशक टी वी नरेंद्रन ने कहा कि निम्न-कार्बन इस्पात निर्माण की ओर बदलाव इस बात पर निर्भर करेगा कि उद्योग तकनीक, नवाचार और साझेदारियों की मदद से अपनी मौजूदा उत्पादन व्यवस्थाओं पर नए सिरे से विचार करके उन्हें कितना बदल पाता है। दोनों कंपनियों ने जून 2023 में समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए थे और अंतिम समझौतों की ओर बढ़ने से पहले फ्रंट-एंड इंजीनियरिंग अध्ययन पूरे कर लिए हैं। यह परियोजना टाटा स्टील के 2045 तक नेट-ज़ीरो उत्सर्जन के लक्ष्य की दिशा में अहम पड़ाव है। यह लक्ष्य दुनिया की प्रमुख इस्पात कंपनियों के सबसे महत्वाकांक्षी लक्ष्यों में शामिल है। परियोजना राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन और सकल घरेलू उत्पाद की उत्सर्जन तीव्रता घटाने से जुड़े भारत के राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदानों के अनुरूप भी है। भारत का इस्पात क्षेत्र देश के कुल कार्बन उत्सर्जन में लगभग 10-12 प्रतिशत योगदान देता है। बड़े पैमाने पर EASyMelt के सफल परीक्षण से ब्लास्ट फर्नेस के ज़रिए इस्पात बनाने में कार्बन उत्सर्जन घटाने का वैश्विक रास्ता बदल सकता है।
टाटा स्टील और SMS ग्रुप ने जमशेदपुर वर्क्स में दुनिया की पहली EASyMelt ब्लास्ट फर्नेस डीकार्बनाइज़ेशन तकनीक लगाने के लिए अंतिम समझौते किए; CO2 उत्सर्जन में 50 प्रतिशत से अधिक कमी का लक्ष्य
टाटा स्टील ने 21 अप्रैल 2026 को लक्ज़मबर्ग की पॉल वुर्थ (SMS ग्रुप) के साथ अंतिम समझौतों पर हस्ताक्षर किए। इनके तहत जमशेदपुर वर्क्स की 649 घन मीटर आयतन वाली 'E' ब्लास्ट फर्नेस में औद्योगिक स्तर पर दुनिया की पहली EASyMelt डीकार्बनाइज़ेशन तकनीक लगाई जाएगी और CO2 उत्सर्जन में 50 प्रतिशत से अधिक कमी का लक्ष्य रखा गया है। यह तकनीक धातुकर्म कोक की जगह सिनगैस का उपयोग करती है और टाटा स्टील के 2045 के नेट-ज़ीरो लक्ष्य को आगे बढ़ाती है।
मुख्य तथ्य
- टाटा स्टील ने 21 अप्रैल 2026 को औद्योगिक स्तर पर दुनिया में EASyMelt के पहले इस्तेमाल के लिए लक्ज़मबर्ग की पॉल वुर्थ, एस.ए., जो SMS ग्रुप GmbH का हिस्सा है, के साथ अंतिम समझौतों पर हस्ताक्षर किए।
- इस तकनीक का पहला उपयोग झारखंड के जमशेदपुर वर्क्स की 649 घन मीटर आयतन वाली 'E' ब्लास्ट फर्नेस में होगा।
- परियोजना का लक्ष्य मौजूदा ब्लास्ट फर्नेस संचालन की तुलना में CO2 उत्सर्जन में 50 प्रतिशत से अधिक कमी लाना है।
- EASyMelt लोहा बनाने में अपचायक के रूप में इस्तेमाल होने वाले धातुकर्म कोक के एक बड़े हिस्से की जगह सिनगैस का उपयोग करती है। सिनगैस टॉप-गैस के पुनर्चक्रण और कोक-ओवन गैस की रिफॉर्मिंग से तैयार होती है।
- इस व्यवस्था में प्राकृतिक गैस, हाइड्रोजन, अमोनिया या बिजली का इस्तेमाल स्थानीय उपलब्धता के अनुसार किया जा सकता है, जिससे भारत में हरित हाइड्रोजन का इस्तेमाल धीरे-धीरे बढ़ाया जा सके।
- यह परियोजना टाटा स्टील के 2045 तक नेट-ज़ीरो उत्सर्जन के लक्ष्य को आगे बढ़ाती है, जो दुनिया की इस्पात कंपनियों के सबसे महत्वाकांक्षी लक्ष्यों में शामिल है।
- यह राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन और सकल घरेलू उत्पाद की उत्सर्जन तीव्रता घटाने से जुड़े भारत के राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदानों के अनुरूप है। भारत का इस्पात क्षेत्र देश के कुल कार्बन उत्सर्जन में लगभग 10-12 प्रतिशत योगदान देता है।
6-अक्ष वर्गीकरण
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21 अप्रैल 2026 को टाटा स्टील ने ईजीमेल्ट ब्लास्ट-फर्नेस डीकार्बनीकरण समझौते की घोषणा की। इसके संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1) पहली तैनाती झारखंड के जमशेदपुर वर्क्स में टाटा स्टील की 'ई' ब्लास्ट फर्नेस पर होगी। 2) यह समझौता लक्ज़मबर्ग की कंपनी पॉल वुर्थ एस.ए. के साथ हुआ, जो एसएमएस ग्रुप जीएमबीएच का हिस्सा है। ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
दोनों कथन सही हैं। विश्व में औद्योगिक स्तर पर ईजीमेल्ट की पहली तैनाती झारखंड में टाटा स्टील के जमशेदपुर वर्क्स की 649 घन मीटर की 'ई' ब्लास्ट फर्नेस पर होगी। लक्ज़मबर्ग के पॉल वुर्थ, एस.ए. के साथ अंतिम समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए हैं, जो एसएमएस ग्रुप जीएमबीएच का हिस्सा है। परियोजना का लक्ष्य कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में 50 प्रतिशत से अधिक कमी है।
स्रोत: समाचार स्रोत
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
टाटा स्टील ने EASyMelt परियोजना के लिए किस कंपनी के साथ अंतिम समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं?
टाटा स्टील ने लक्ज़मबर्ग की पॉल वुर्थ, एस.ए. के साथ अंतिम समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं। पॉल वुर्थ जर्मनी के SMS ग्रुप GmbH का हिस्सा है।
दुनिया में EASyMelt का पहला उपयोग टाटा स्टील के किस संयंत्र में होगा?
इस तकनीक का पहला उपयोग झारखंड के जमशेदपुर वर्क्स की 649 घन मीटर आयतन वाली 'E' ब्लास्ट फर्नेस में किया जाएगा।
EASyMelt के इस्तेमाल से CO2 उत्सर्जन में कितनी कमी का लक्ष्य है?
परियोजना का लक्ष्य मौजूदा ब्लास्ट फर्नेस संचालन की तुलना में CO2 उत्सर्जन में 50 प्रतिशत से अधिक कमी लाना है।
EASyMelt तकनीक उत्सर्जन कैसे कम करती है?
यह लोहा बनाने में अपचायक के रूप में इस्तेमाल होने वाले धातुकर्म कोक के एक बड़े हिस्से की जगह सिनगैस का उपयोग करती है। सिनगैस टॉप-गैस के पुनर्चक्रण और हाइड्रोकार्बन-समृद्ध गैसों की रिफॉर्मिंग से बनती है। यह तकनीक हाइड्रोजन और बिजली सहित कई ऊर्जा स्रोतों का इस्तेमाल भी कर सकती है।
यह घोषणा भारत के लिए रणनीतिक रूप से क्यों महत्वपूर्ण है?
भारत का इस्पात क्षेत्र देश के कुल कार्बन उत्सर्जन में लगभग 10-12 प्रतिशत योगदान देता है। औद्योगिक स्तर पर EASyMelt का सफल परीक्षण टाटा स्टील के 2045 के नेट-ज़ीरो लक्ष्य, राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन और सकल घरेलू उत्पाद की उत्सर्जन तीव्रता घटाने से जुड़े भारत के राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदानों को आगे बढ़ाता है।
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