एक ऐतिहासिक फैसले में दिल्ली उच्च न्यायालय ने बुधवार को कहा कि देश का सबसे बड़ा शेयर बाज़ार नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम की धारा 2(h) के तहत एक "लोक प्राधिकरण" है, जिससे यह पारदर्शिता कानून के दायरे में आ गया है। इस निर्णय ने 16 वर्ष लंबी कानूनी लड़ाई को समाप्त कर दिया। न्यायमूर्ति सी. हरि शंकर और न्यायमूर्ति ओम प्रकाश शुक्ला की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने न्यायमूर्ति संजीव खन्ना की एकल पीठ के 2010 के फैसले को बरकरार रखा और कहा कि एकल न्यायाधीश का तर्क "सुस्पष्ट एवं तर्कसंगत" है तथा निष्कर्षों में हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं है। आदेश में कहा गया कि "न केवल केंद्र सरकार, बल्कि एक वैधानिक प्राधिकरण भी स्टॉक एक्सचेंज पर गहरा और व्यापक नियंत्रण रखता है।" NSE ने तर्क दिया था कि वह एक निजी संस्था है, जिसका न तो सरकार स्वामित्व रखती है और न ही नियंत्रण, और भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (SEBI) की नियामकीय निगरानी उसे RTI के दायरे में नहीं लाती। इसे अस्वीकार करते हुए न्यायालय ने कहा कि भले ही NSE का गठन निजी कंपनी के रूप में हुआ, वह प्रतिभूति संविदा (विनियमन) अधिनियम, 1956 की धारा 4 के तहत मान्यता के बिना स्टॉक एक्सचेंज के रूप में कार्य नहीं कर सकता — यह मान्यता केंद्र सरकार द्वारा प्रत्यायोजित शक्तियों के तहत SEBI ने प्रदान की थी। न्यायालय ने कहा कि स्वामित्व और वित्तपोषण ही कानून के अंतर्गत एकमात्र कसौटी नहीं हैं। अधिवक्ताओं के अनुसार यह फैसला एक्सचेंजों के वाणिज्यिक या नीतिगत निर्णयों में अदालती हस्तक्षेप का कारण नहीं बनेगा, किंतु यह शासन एवं नियामकीय कामकाज में पारदर्शिता बढ़ाएगा तथा निवेशकों का विश्वास मज़बूत करेगा।