ISRO ने जुलाई 2025 में प्रक्षेपित निसार मिशन के वैज्ञानिक चरण में प्रवेश की घोषणा की। निसार, नासा और ISRO का संयुक्त पृथ्वी-अवलोकन मिशन है। इसका पूरा नाम नासा-इसरो सिंथेटिक अपर्चर रडार है। परीक्षा की दृष्टि से यह खबर अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी, रिमोट सेंसिंग, पर्यावरण निगरानी और भारत-अमेरिका वैज्ञानिक सहयोग को एक साथ जोड़ती है।

निसार की खासियत दोहरी-आवृत्ति रडार क्षमता है। इसमें एल-बैंड और एस-बैंड सिंथेटिक अपर्चर रडार लगे हैं। इसी वजह से यह पृथ्वी के पारिस्थितिक तंत्र, बर्फीले क्षेत्रों, वनस्पति और भूतल में बदलावों से जुड़े डेटा देगा। ISRO ने मिशन के उपयोग क्षेत्रों में कृषि, वन, जल-विज्ञान, हिमालयी बर्फ और भू-विज्ञान जैसे क्षेत्रों को भी रखा है। ऐसे डेटा का संबंध आपदा जोखिम, जल संसाधन, भूमि-उपयोग और जलवायु-संबंधी अध्ययन से है।

मिशन को जीएसएलवी-एफ16 से 30 जुलाई 2025 को प्रक्षेपित किया गया था। प्रक्षेपण के बाद 12 मीटर व्यास वाला एंटीना रिफ्लेक्टर सफलतापूर्वक तैनात हुआ। वैज्ञानिक चरण का मतलब है कि उपग्रह अब अपने मुख्य वैज्ञानिक काम के लिए तैयार अवस्था में पहुंच गया है। शुरुआती एस-बैंड इमेजिंग में भारतीय भू-भाग और कैलिब्रेशन-वैलिडेशन स्थलों की तस्वीरें ली गईं; गोदावरी डेल्टा की शुरुआती इमेज में कृषि क्षेत्र, मैंग्रोव और जलीय कृषि क्षेत्र साफ दिखे।

स्टैटिक जीके से इसका लिंक रिमोट सेंसिंग, सिंथेटिक अपर्चर रडार, पृथ्वी-अवलोकन उपग्रह, उपग्रह कक्षा और पर्यावरणीय निगरानी से बनता है। प्रीलिम्स में मिशन के साझेदारों, रडार बैंड, लॉन्च वाहन और उपयोग क्षेत्रों पर सवाल आ सकता है। मुख्य परीक्षा में यह उदाहरण अंतरिक्ष तकनीक के नागरिक उपयोग, पर्यावरणीय निगरानी, कृषि और जल प्रबंधन तथा हिमालयी बर्फ और भूमि विरूपण की निगरानी जैसे बिंदुओं में काम आएगा।