8 नवंबर 2025 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 'कानूनी सहायता प्रदान करने की व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने पर राष्ट्रीय सम्मेलन' को संबोधित किया, जिसमें 'न्याय की सुगमता' की अवधारणा पर जोर दिया गया। इसका अर्थ है कि प्रत्येक नागरिक, विशेषकर गरीब और हाशिए पर रहने वाले लोगों के लिए कानूनी सेवाएँ सुलभ, सस्ती और समावेशी हों। विधि और न्याय मंत्रालय के अंतर्गत राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA) द्वारा आयोजित इस सम्मेलन में पूरे भारत के कानूनी सहायता प्राधिकरणों, न्यायाधीशों, अधिवक्ताओं और नागरिक समाज के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि न्याय तक पहुँच अनुच्छेद 39A (राज्य के नीति निदेशक तत्व) के तहत एक संवैधानिक नीति-निदेशक सिद्धांत है, जिसके अनुसार राज्य को यह सुनिश्चित करना है कि आर्थिक या अन्य अक्षमताओं के कारण कोई भी नागरिक न्याय से वंचित न रहे। विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 के तहत स्थापित NALSA राज्य, जिला और तालुक विधिक सेवा समितियों के ज़रिए कानूनी सहायता का समन्वय करती है। सम्मेलन में डिजिटल पोर्टल और प्रौद्योगिकी के उपयोग, न्याय बंधु (निःशुल्क विधिक सेवाएँ), टेली-लॉ के विस्तार और मध्यस्थता अधिनियम, 2023 के ढाँचे को मजबूत करने पर ध्यान केंद्रित किया गया। राजस्थान की SLSA लोक अदालतों के ज़रिए प्रति वर्ष 1.5 लाख से अधिक मामलों का निपटारा करती है।
'न्याय की सुगमता' पर PM मोदी का जोर: कानूनी सहायता देने की व्यवस्था को मजबूत करने पर राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित
8 नवंबर 2025 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 'कानूनी सहायता प्रदान करने की व्यवस्था को सुदृढ़ करने पर राष्ट्रीय सम्मेलन' को संबोधित किया, जिसमें 'न्याय की सुगमता' की अवधारणा पर जोर दिया गया — यानी यह सुनिश्चित करना कि प्रत्येक नागरिक, विशेषकर गरीब और हाशिए पर रहने वाले लोगों को कानूनी सेवाएँ सुलभ, सस्ती और समावेशी रूप से मिलें। विधि और न्याय मंत्रालय के अंतर्गत राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA) द्वारा आयोजित इस सम्मेलन में पूरे भारत के कानूनी सहायता प्राधिकरण, न्यायाधीश, अधिवक्ता और नागरिक समाज के प्रतिनिधि शामिल हुए। PM मोदी ने कहा कि न्याय तक पहुँच अनुच्छेद 39A (राज्य के नीति निदेशक तत्व) के तहत एक संवैधानिक नीति-निर्देशक सिद्धांत है, जो राज्य को यह सुनिश्चित करने का निर्देश देता है कि आर्थिक या अन्य असमर्थताओं के कारण किसी भी नागरिक को न्याय से वंचित न किया जाए। विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 के तहत स्थापित NALSA राज्य, जिला और तालुक विधिक सेवा समितियों के ज़रिए कानूनी सहायता का समन्वय करती है। सम्मेलन में डिजिटल पोर्टल और प्रौद्योगिकी के उपयोग, न्याय बंधु (प्रो-बोनो सेवाएँ), टेली-लॉ के विस्तार और मध्यस्थता अधिनियम, 2023 के ढाँचे को मजबूत करने पर ध्यान केंद्रित किया गया। राजस्थान की SLSA लोक अदालतों के ज़रिए प्रति वर्ष 1.5 लाख से अधिक मामलों का निपटारा करती है।
मुख्य तथ्य
- प्रधानमंत्री मोदी ने 8 नवंबर 2025 को कानूनी सहायता प्रदान करने की व्यवस्था को सुदृढ़ करने पर राष्ट्रीय सम्मेलन को संबोधित किया।
- 'न्याय की सुगमता' पर जोर — सभी नागरिकों के लिए सुलभ, सस्ती, समावेशी कानूनी सेवाएं।
- अनुच्छेद 39A (DPSP) कहता है कि आर्थिक कमजोरी के कारण किसी को न्याय से वंचित न किया जाए।
- NALSA राज्य, जिला और तालुक विधिक सेवा प्राधिकरणों के ज़रिए कानूनी सहायता का समन्वय करती है।
- सम्मेलन में डिजिटल पोर्टल, ई-लोक अदालत और टेली-लॉ सेवाओं सहित प्रौद्योगिकी के उपयोग पर ध्यान केंद्रित किया गया।
- राजस्थान की SLSA लोक अदालतों के ज़रिए प्रतिवर्ष 1.5 लाख से अधिक मामलों का निपटारा करती है।
मेन्स दृष्टिकोण
प्रश्न: अनुच्छेद 39क के अंतर्गत निःशुल्क कानूनी सहायता की संवैधानिक गारंटी को क्रियान्वित करने में राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (नालसा) की भूमिका पर चर्चा कीजिए तथा 11 नवंबर 2025 के प्रधानमंत्री मोदी के 'न्याय की सुगमता' संबोधन का संदर्भ लें।
उत्तर (50 शब्द):
11 नवंबर 2025 को प्रधानमंत्री मोदी ने नालसा के कानूनी सहायता सम्मेलन को संबोधित किया तथा 'न्याय की सुगमता' और अनुच्छेद 39क पर जोर दिया। विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 के तहत स्थापित नालसा टेली-लॉ, न्याय बंधु और लोक अदालतों का समन्वय करती है; राजस्थान में वार्षिक 1.5 लाख मामले निपटते हैं।
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कानूनी सहायता वितरण तंत्र को मजबूत करने पर राष्ट्रीय सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संबोधन में मुख्य रूप से शासन के किस उद्देश्य पर जोर दिया गया?
इस संबोधन में मजबूत कानूनी-सहायता व्यवस्था को 'Ease of Justice' के विचार से जोड़ा गया। जोर इस बात पर था कि न्याय और कानूनी सेवाएं गरीब और हाशिये पर खड़े नागरिकों सहित सभी लोगों के लिए अधिक सुलभ, किफायती और समावेशी बनें। इसलिए दिए गए विकल्पों में शासन और नीतिगत सुधार वाला विकल्प सबसे उपयुक्त है।
स्रोत: PIB
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
'न्याय की सुगमता' क्या है और नवंबर 2025 के राष्ट्रीय सम्मेलन में इसे किसने पेश किया?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 11 नवंबर 2025 को 'कानूनी सहायता प्रदान तंत्र सुदृढ़ीकरण पर राष्ट्रीय सम्मेलन' में 'न्याय की सुगमता' की अवधारणा पेश की। इसका मतलब है कि सभी नागरिकों — विशेषकर गरीब और हाशिए पर रहने वाले लोगों — के लिए कानूनी सेवाएँ सुलभ, सस्ती और समावेशी हों, ठीक उसी तरह जैसे 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' व्यापार-अनुकूल माहौल सुनिश्चित करता है।
NALSA क्या है और कानूनी सहायता प्रदान करने में इसकी क्या भूमिका है?
NALSA यानी राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण पूरे भारत में तीन स्तरीय संरचना से मुफ्त कानूनी सहायता का समन्वय करता है: राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (SLSA), जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA) और तालुक विधिक सेवा समितियाँ। NALSA विधि और न्याय मंत्रालय के अंतर्गत विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 के तहत स्थापित है।
कौन सा संवैधानिक प्रावधान आर्थिक रूप से कमजोर नागरिकों को मुफ्त कानूनी सहायता का अधिकार देता है?
राज्य नीति के निदेशक तत्वों (DPSP) का अनुच्छेद 39A राज्य को निर्देश देता है कि समान न्याय और मुफ्त कानूनी सहायता सुनिश्चित की जाए, ताकि आर्थिक या अन्य अक्षमता के कारण कोई भी नागरिक न्याय पाने से वंचित न रहे। इस अनुच्छेद को 1976 में 42वें संविधान संशोधन द्वारा जोड़ा गया था।
भारत में कानूनी सहायता बेहतर बनाने के लिए प्रौद्योगिकी का उपयोग कैसे हो रहा है?
नवंबर 2025 के राष्ट्रीय सम्मेलन में AI-सहायित कानूनी चैटबॉट के उपयोग पर जोर दिया गया, जो क्षेत्रीय भाषाओं में बुनियादी कानूनी प्रश्नों के उत्तर देते हैं। साथ ही टेली-लॉ सेवाओं पर भी जोर रहा, जिनसे ग्रामीण नागरिक दूर बैठे कानूनी पेशेवरों से जुड़ पाते हैं। ये प्रौद्योगिकियाँ उन क्षेत्रों में कानूनी सेवाओं की कमी दूर करने में मदद करती हैं जहाँ वकील या कानूनी सहायता केंद्र कम हैं।
राजस्थान राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण कानूनी सहायता में क्या भूमिका निभाता है?
राजस्थान राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (SLSA) मुफ्त कानूनी सहायता देने में सक्रिय भूमिका निभाता है। इसकी लोक अदालत व्यवस्था विशेष रूप से उल्लेखनीय है — इन लोक अदालतों में SLSA हर साल 1.5 लाख से अधिक मामलों का निपटारा करता है, जिससे औपचारिक अदालतों में लंबित मामलों की संख्या घटती है। लोक अदालतें बिना कोर्ट फीस के त्वरित, सहमति-आधारित विवाद समाधान प्रदान करती हैं।
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