केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने 9 जून 2026 को स्पष्ट किया कि सरकार की सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सामग्री हटाने के आदेश जारी करने की शक्ति केवल डीपफेक सामग्री तक ही सीमित है। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि वास्तविक सामग्री और विरोध प्रदर्शन के वीडियो सरकारी हटाने के आदेशों के अंतर्गत नहीं आते।

यह स्पष्टीकरण YouTube पर कई वीडियो हटाए जाने को लेकर उठे विवाद के बीच आया, जिसमें यह आरोप भी शामिल था कि CBSE मूल्यांकन से पीड़ित एक छात्र के समर्थन में बना वीडियो सरकार के कहने पर हटाया गया। वैष्णव के बयान ने एक स्पष्ट कानूनी और नीतिगत रेखा खींची: राज्य की शक्ति केवल कृत्रिम बुद्धिमत्ता द्वारा निर्मित सिंथेटिक मीडिया — विशेष रूप से डीपफेक — पर लागू होती है, न कि प्रामाणिक उपयोगकर्ता-निर्मित सामग्री पर।

भारत के डीपफेक नियामक ढांचे को मजबूत करते हुए दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं, जिनके तहत सोशल मीडिया मध्यस्थों को सभी AI-निर्मित सामग्री पर लेबल लगाना होगा और शिकायत के 3 घंटे के भीतर चिह्नित डीपफेक सामग्री हटानी होगी।

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर, भारत 30 से अधिक देशों के साथ डीपफेक की बढ़ती चुनौती से निपटने के लिए तकनीकी और कानूनी समाधान विकसित करने हेतु समन्वय कर रहा है। यह बहुपक्षीय सहयोग इस बात को रेखांकित करता है कि डीपफेक तकनीक राष्ट्रीय सीमाओं को पार करती है और वैश्विक शासन की आवश्यकता है।

मंत्री का यह स्पष्टीकरण डिजिटल अधिकारों की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। यह सरकार की सामग्री नियंत्रण शक्ति के इर्द-गिर्द एक दृढ़ सीमा खींचता है — AI-हेरफेर किए गए मीडिया और वास्तविक अभिव्यक्ति के बीच अंतर स्थापित करता है।