वाणिज्य एवं उद्योग विभाग के अंतर्गत आर्थिक सलाहकार कार्यालय द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, थोक मूल्य सूचकांक (WPI) से मापी जाने वाली भारत की थोक मुद्रास्फीति मार्च 2026 के 3.9 प्रतिशत से दोगुने से अधिक बढ़कर अप्रैल 2026 में 42 महीने के उच्चस्तर 8.3 प्रतिशत पर पहुंच गई। इसका प्रमुख कारण ईंधन एवं बिजली समूह में तेज उछाल था, जहां मुद्रास्फीति पिछले महीने के मात्र 1.05 प्रतिशत से बढ़कर अप्रैल में 24.71 प्रतिशत हो गई। इसके पीछे पश्चिम एशिया संकट और अमेरिकी डॉलर के मुकाबले कमजोर रुपए के बीच कच्चे पेट्रोलियम और उससे बने उत्पादों की कीमतों में उछाल था। अप्रैल 2026 में भारतीय कच्चे तेल टोकरी का औसत लगभग 115 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल रहा। इसके विपरीत, सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय द्वारा संकलित उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) से मापी जाने वाली खुदरा मुद्रास्फीति अपेक्षाकृत नियंत्रित रही। यह मार्च के 3.4 प्रतिशत से बढ़कर अप्रैल 2026 में 3.48 प्रतिशत हो गई, जो एक वर्ष में सबसे तेज खुदरा मुद्रास्फीति है। CPI के अंतर्गत खाद्य मुद्रास्फीति 3.87 प्रतिशत से बढ़कर 4.2 प्रतिशत हो गई। दोनों सूचकांकों के बीच अंतर से पता चलता है कि WPI में ईंधन और विनिर्मित उत्पादों को बहुत अधिक भार दिया जाता है, इसलिए उस पर वैश्विक जिंस कीमतों के झटकों का असर अधिक सीधे पड़ता है, जबकि CPI में खाद्य और सेवाओं का भार अधिक होता है। यह बढ़ता अंतर चिंता पैदा करता है कि लागत-जनित दबाव अंततः उपभोक्ताओं तक पहुंच सकता है। इससे भारतीय रिज़र्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति के सामने नीतिगत चुनौती खड़ी होती है, जिसने रेपो दर को तटस्थ रुख के साथ 5.25 प्रतिशत पर रखा है।