केंद्र सरकार 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया उपयोग को विनियमित करने के लिए अलग कानून पर विचार कर रही है। प्रस्तावित व्यवस्था का मुख्य बिंदु यह है कि सभी बच्चों पर एक जैसा पूर्ण प्रतिबंध लगाने के बजाय उम्र के आधार पर श्रेणीबद्ध प्रतिबंधों का ढांचा अपनाया जा सकता है। हितधारकों से परामर्श के बाद प्रस्तावित कानून संसद के मानसून सत्र में पेश किया जा सकता है। 8 मार्च 2026 की समसामयिकी में यह राष्ट्रीय स्तर का शासन-संबंधी मुद्दा है।

परीक्षा की दृष्टि से यह विषय शासन, कानून बनाने की प्रक्रिया, डेटा संरक्षण और बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा से जुड़ता है। चूंकि नीति का रुख श्रेणीबद्ध और उम्र-आधारित बताया गया है, इसलिए यह केवल रोक लगाने वाला कदम नहीं दिखता। इसमें उम्र के हिसाब से संतुलित विनियमन पर जोर है। इससे बाल सुरक्षा, अभिभावकीय भूमिका, प्लेटफ़ॉर्म जवाबदेही और डेटा संरक्षण जैसे प्रश्न उठते हैं।

स्टैटिक जीके से जोड़कर देखें तो डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 बच्चों के निजी डेटा के प्रसंस्करण से पहले अभिभावक की सत्यापनीय सहमति और बच्चे के हितों पर प्रतिकूल प्रभाव से बचने जैसे प्रावधानों से जुड़ा है। वैश्विक संदर्भ में ऑस्ट्रेलिया ने 2024 में कानून बनाकर 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया अकाउंट रोकने की व्यवस्था की, जो 10 दिसंबर 2025 से प्रभावी हुई। भारत का प्रस्तावित रास्ता इसी बहस में अलग है, क्योंकि इसमें पूर्ण प्रतिबंध नहीं बल्कि श्रेणीबद्ध, उम्र-आधारित व्यवस्था की बात है। RAS और UPSC जैसी परीक्षाओं में प्रारंभिक परीक्षा के लिए 18 वर्ष से कम उम्र, अलग कानून, मानसून सत्र, हितधारक परामर्श और उम्र-आधारित ढांचा महत्वपूर्ण तथ्य हैं। मुख्य परीक्षा में इसे डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म शासन, बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा और कानून लाने से पहले परामर्श-आधारित नीति प्रक्रिया के उदाहरण के रूप में लिखा जा सकता है।