केंद्र सरकार 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल के लिए अलग कानून पर विचार कर रही है। प्रस्तावित व्यवस्था का मुख्य विचार यह है कि सभी बच्चों पर एक जैसा पूर्ण प्रतिबंध लगाने के बजाय उम्र के आधार पर अलग-अलग स्तर के प्रतिबंध लगाए जाएं। हितधारकों से परामर्श के बाद यह विधेयक संसद के मानसून सत्र में पेश किया जा सकता है। इसलिए यह विषय डिजिटल गवर्नेंस और बाल-सुरक्षा से जुड़ी नीति-बहस के रूप में महत्वपूर्ण है।

परीक्षा की दृष्टि से इसका पहला पहलू शासन और कानून-निर्माण है। सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म बच्चों की पढ़ाई, संवाद और सूचना-प्राप्ति से जुड़े हैं, लेकिन उनके अत्यधिक इस्तेमाल, सुरक्षा जोखिम और स्क्रीन टाइम को लेकर चिंता भी बढ़ी है। इसी कारण सरकार पूर्ण रोक के बजाय ऐसी श्रेणीबद्ध व्यवस्था पर विचार कर रही है जिसमें उम्र के हिसाब से प्रतिबंधों की तीव्रता अलग हो सकती है। यह नीति-निर्माण में संतुलन का उदाहरण है, जहां बाल-सुरक्षा, डिजिटल पहुंच और सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म के नियमन को साथ रखकर निर्णय लेना पड़ता है।

दूसरा पहलू डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 से जुड़ता है। इस अधिनियम में बच्चों के व्यक्तिगत डेटा के प्रसंस्करण से पहले माता-पिता की सत्यापनीय सहमति, बच्चों के हित को नुकसान पहुंचाने वाले डेटा-प्रसंस्करण पर रोक, और बच्चों पर नज़र रखने, व्यवहार आधारित निगरानी तथा टार्गेटेड विज्ञापन पर प्रतिबंध जैसे प्रावधान हैं। प्रस्तावित सोशल मीडिया कानून बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा से जुड़ी व्यापक बहस को आगे बढ़ा सकता है, लेकिन इसका दायरा सोशल मीडिया उपयोग के नियमन पर केंद्रित होगा। RAS और UPSC में यह विषय प्रारंभिक परीक्षा में समसामयिकी, शासन और सोशल मीडिया नियमन के प्रश्नों में, तथा मुख्य परीक्षा में राज्य की नियामक भूमिका, बाल-अधिकार और तकनीक-नीति के विश्लेषण में उपयोगी है।