6 फरवरी 2026, शुक्रवार को राज्यसभा सांसद पी. विल्सन ने निजी सदस्य विधेयक के रूप में संविधान (संशोधन) विधेयक, 2026 पेश किया। इसमें भारत की उच्च न्यायपालिका के लिए दो प्रमुख सुधार प्रस्तावित हैं: उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय में न्यायिक नियुक्तियों के दौरान सामाजिक विविधता अनिवार्य करना तथा नई दिल्ली की प्रधान पीठ के अतिरिक्त चेन्नई, मुंबई और कोलकाता में सर्वोच्च न्यायालय की क्षेत्रीय पीठें स्थापित करना।

विधेयक के संदर्भ में प्रस्तुत आँकड़ों के अनुसार, 2018 से 22 जुलाई 2024 तक नियुक्त उच्च न्यायालयों के 661 न्यायाधीशों में से 499 सामान्य वर्ग से थे; उच्च न्यायालयों में केवल 14% न्यायाधीश महिलाएँ हैं; उच्च न्यायपालिका की नियुक्तियों में धार्मिक अल्पसंख्यकों की हिस्सेदारी 5% से कम है; और सर्वोच्च न्यायालय में अभी केवल एक महिला न्यायाधीश हैं। जनवरी 2026 तक सर्वोच्च न्यायालय में 90,000 से अधिक मामले लंबित थे, जबकि फरवरी 2026 में उच्च न्यायालयों के लगभग 27.5% पद रिक्त थे।

विधेयक में कॉलेजियम प्रणाली को अधिक पारदर्शी बनाने, वंचित वर्गों के वकीलों के लिए मार्गदर्शन कार्यक्रम चलाने और न्यायिक नियुक्तियों में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद जैसी क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व व्यवस्था अपनाने का प्रस्ताव है। क्षेत्रीय पीठें बनने से राजस्थान जैसे राज्यों के उन वादियों का आर्थिक और व्यावहारिक बोझ घटेगा, जिन्हें अभी सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई के लिए नई दिल्ली जाना पड़ता है। यह न्याय तक पहुँच से जुड़ी एक महत्वपूर्ण चिंता है। यह विधेयक न्यायिक जवाबदेही, कॉलेजियम सुधार और अनुच्छेद 14 तथा 16 के तहत समानता के संवैधानिक अधिकार पर जारी बहस को रेखांकित करता है।