प्रकाशित: 22 जनवरी 2026शासन
सर्वोच्च न्यायालय ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17A पर विभाजित फ़ैसला सुनाया
भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने 13 जनवरी 2026 को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 17A की संवैधानिक वैधता पर विभाजित फ़ैसला सुनाया। इस प्रावधान के अनुसार, लोक सेवकों ने अपने सरकारी दायित्व निभाते हुए जो फ़ैसले लिए हों, उनसे जुड़े भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच से पहले सरकार की मंज़ूरी लेना अनिवार्य है। यह धारा भ्रष्टाचार निवारण (संशोधन) अधिनियम, 2018 के ज़रिए जोड़ी गई थी।
दो न्यायाधीशों की पीठ में एक न्यायाधीश ने माना कि धारा 17A जांच को सरकारी मंज़ूरी पर निर्भर बनाकर भ्रष्टाचार के खिलाफ प्रभावी जांच और कार्रवाई में अनुचित तथा असंवैधानिक बाधा खड़ी करती है। इससे भ्रष्ट अधिकारी जवाबदेही से बच सकते हैं। न्यायाधीश ने कहा कि यह प्रावधान आपराधिक जांच में लोक सेवकों और सामान्य नागरिकों के बीच मनमाना भेद करता है और इस तरह अनुच्छेद 14 में मिले समानता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन करता है।
दूसरे न्यायाधीश ने इस प्रावधान को ईमानदार नौकरशाहों को निराधार, दुर्भावनापूर्ण और परेशान करने के इरादे से किए गए मुकदमों से बचाने के लिए ज़रूरी और उचित सुरक्षा माना। ऐसे मुकदमे प्रशासनिक फ़ैसले लेने की प्रक्रिया को ठप कर सकते हैं। उनका कहना था कि यह सुरक्षा न हो तो आपराधिक मुकदमे के डर से अधिकारी निर्भीक होकर नीतिगत फ़ैसले लेने से हिचकेंगे। पीठ के विभाजित फ़ैसले के कारण मामला अंतिम निर्णय के लिए बड़ी पीठ को भेज दिया गया है। इस फ़ैसले का देशभर में भ्रष्टाचार-विरोधी जांचों पर अहम असर पड़ेगा, खासकर वरिष्ठ नौकरशाहों और सरकारी अधिकारियों से जुड़े केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) तथा राज्यों के भ्रष्टाचार-विरोधी ब्यूरो के मामलों पर। कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यह मामला भ्रष्टाचार से निपटने और ईमानदार नीयत से की गई प्रशासनिक कार्रवाई की सुरक्षा के बीच संतुलन को नए सिरे से तय कर सकता है।
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जुड़ा प्रश्नमध्यम
संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) मूल रूप से किस वर्ष स्थापित किया गया था?
व्याख्या · सही उत्तर DUPSC की स्थापना 1 अक्टूबर 1926 को भारत सरकार अधिनियम 1919 के तहत हुई थी और 1 अक्टूबर 2025 को शताब्दी समारोह शुरू हुए।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17A पर सर्वोच्च न्यायालय का विभाजित फ़ैसला क्या था?
**भारत के सर्वोच्च न्यायालय** ने **भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (PCA), 1988** की **धारा 17A** पर **विभाजित फ़ैसला** दिया। धारा 17A के तहत सरकारी फ़ैसलों से संबंधित अपराधों में पुलिस किसी लोक सेवक के विरुद्ध जांच या पूछताछ शुरू करे, उससे पहले **सक्षम प्राधिकारी की मंज़ूरी** लेना ज़रूरी है। न्यायाधीशों के मतभेद के कारण कोई निर्णायक फ़ैसला नहीं आया और संवैधानिक सवाल अनसुलझा रहा। इसलिए इस कानूनी सवाल के अंतिम निर्णय के लिए मामला **बड़ी पीठ** को भेजा गया।
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17A क्या है और यह विवादास्पद क्यों है?
**भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (PCA) की धारा 17A**, जिसे **भ्रष्टाचार निवारण (संशोधन) अधिनियम, 2018** के ज़रिए जोड़ा गया था, के अनुसार पुलिस या CBI किसी **लोक सेवक** के सरकारी दायित्व निभाते हुए किए गए कामों की जांच **सरकार की पूर्व मंज़ूरी** के बिना नहीं कर सकती। आलोचकों का कहना है कि मंज़ूरी की यह शर्त भ्रष्ट अधिकारियों को जांच से बचा सकती है। समर्थकों के अनुसार यह ईमानदार अधिकारियों को **निराधार या राजनीति से प्रेरित मुकदमों** से बचाती है। इसकी संवैधानिक वैधता पर समानता के सिद्धांत और अनुच्छेद 14 के आधार पर विवाद है।
सर्वोच्च न्यायालय के विभाजित फ़ैसले का क्या महत्व है?
सर्वोच्च न्यायालय में **विभाजित फ़ैसला** तब होता है, जब पीठ के दो या अधिक न्यायाधीश नतीजे पर सहमत नहीं होते और कोई निर्णायक फ़ैसला नहीं आ पाता। इसके बाद अंतिम निर्णय के लिए मामला **बड़ी पीठ** को भेजा जाता है। धारा 17A के मामले में लोक सेवकों को मिली सुरक्षा की वैधता तब तक कानूनी रूप से अनिश्चित रहेगी, जब तक बड़ी संविधान पीठ निर्णायक फ़ैसला नहीं देती। इससे देशभर में लंबित भ्रष्टाचार के मामले प्रभावित होंगे।
2018 में संशोधित भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के प्रमुख प्रावधान क्या हैं?
**भ्रष्टाचार निवारण (संशोधन) अधिनियम, 2018** ने कई प्रमुख बदलाव किए: **धारा 17A** के तहत लोक सेवकों की जांच के लिए पूर्व मंज़ूरी अनिवार्य की गई; **रिश्वत** की परिभाषा को केवल स्वीकार करने तक सीमित न रखकर उसकी मांग को भी शामिल किया गया; रिश्वत देने वाले को भी आपराधिक रूप से उत्तरदायी बनाया गया; **सज़ा बढ़ाकर** अधिकतम 7 वर्ष का कारावास किया गया; और संपत्ति की **कुर्की तथा ज़ब्ती** के प्रावधान जोड़े गए। इन बदलावों का एक उद्देश्य भारत के कानून को **भ्रष्टाचार के विरुद्ध संयुक्त राष्ट्र अभिसमय (UNCAC)** के अनुरूप बनाना भी था, जिसका भारत ने 2011 में अनुमोदन किया था।
धारा 17A के तहत पूर्व मंज़ूरी की शर्त भारत में भ्रष्टाचार-विरोधी जांच को कैसे प्रभावित करती है?
**धारा 17A के तहत पूर्व मंज़ूरी की शर्त** से भ्रष्टाचार-विरोधी जांच काफी धीमी हो गई है। **CBI और राज्यों के भ्रष्टाचार-विरोधी ब्यूरो** को भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS), भारतीय पुलिस सेवा (IPS) और अन्य वरिष्ठ लोक सेवकों के खिलाफ प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज करने से पहले सरकार की मंज़ूरी लेनी होती है। आंकड़ों के अनुसार मंज़ूरी के अनुरोधों में अक्सर देरी होती है या उन्हें ठुकरा दिया जाता है। आलोचक इसे नौकरशाही में भ्रष्टाचार को मिलने वाला **संस्थागत संरक्षण** मानते हैं, जबकि समर्थकों का तर्क है कि यह **कानून का शासन** बनाए रखती है और अधिकारियों को उत्पीड़न से बचाती है।