भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने 13 जनवरी 2026 को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 17A की संवैधानिक वैधता पर विभाजित फैसला सुनाया। यह प्रावधान लोक सेवकों द्वारा आधिकारिक दायित्व निभाते समय लिए गए निर्णयों से जुड़े भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच शुरू करने से पहले सरकार की पूर्व मंजूरी अनिवार्य करता है। यह धारा भ्रष्टाचार निवारण (संशोधन) अधिनियम, 2018 द्वारा जोड़ी गई थी।

दो न्यायाधीशों की पीठ में एक न्यायाधीश ने माना कि धारा 17A जांच को सरकारी मंजूरी पर निर्भर बनाकर भ्रष्टाचार-विरोधी कार्रवाई में अनुचित और असंवैधानिक बाधा खड़ी करती है, जिससे भ्रष्ट अधिकारियों को जवाबदेही से बचने का मौका मिल सकता है। न्यायाधीश ने कहा कि यह प्रावधान आपराधिक जांच में लोक सेवकों और सामान्य नागरिकों के बीच मनमाना भेद करता है और इस तरह अनुच्छेद 14 के तहत समानता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन करता है।

दूसरे न्यायाधीश ने इस प्रावधान को ईमानदार नौकरशाहों को तुच्छ, दुर्भावनापूर्ण और परेशान करने वाली मुकदमेबाजी से बचाने के लिए आवश्यक और उचित सुरक्षा माना, क्योंकि ऐसी मुकदमेबाजी प्रशासनिक निर्णय लेने की प्रक्रिया को पंगु बना सकती है। विभाजित फैसले को देखते हुए मामला अंतिम निर्णय के लिए बड़ी पीठ को भेज दिया गया है। इस फैसले का देशभर में भ्रष्टाचार-विरोधी जांचों पर महत्वपूर्ण असर पड़ेगा, खासकर वरिष्ठ नौकरशाहों और सरकारी अधिकारियों से जुड़े CBI तथा राज्य भ्रष्टाचार-विरोधी ब्यूरो के मामलों पर।