विज्ञान एवं पर्यावरण केंद्र तथा डाउन टू अर्थ पत्रिका ने विश्व पर्यावरण दिवस की पूर्व संध्या पर 4 जून 2026 को इन फिगर्स में भारत के पर्यावरण की स्थिति 2026 रिपोर्ट जारी की, जो आधिकारिक सरकारी आँकड़ों के आधार पर भारत की एकीकृत तस्वीर प्रस्तुत करती है। यह रिपोर्ट जलवायु परिवर्तन और चरम मौसम, सार्वजनिक स्वास्थ्य, वन, जैव विविधता, पानी, वायु प्रदूषण, अपशिष्ट तथा प्रमुख सतत विकास लक्ष्य संकेतकों पर भारतीय राज्यों के प्रदर्शन के रुझानों को ट्रैक करती है।
2026 संस्करण की एक प्रमुख चेतावनी यह है कि पृथ्वी प्रणाली वैज्ञानिकों द्वारा पहचानी गई नौ ग्रहीय सीमाओं में से सात अब पार हो चुकी हैं, इनमें जलवायु परिवर्तन, जैवमंडल अखंडता, भूमि प्रणाली परिवर्तन, मीठे पानी का ह्रास, नाइट्रोजन और फॉस्फोरस के जैव भू रसायनिक प्रवाह, प्लास्टिक और रसायनों जैसी नई संस्थाएँ तथा महासागर अम्लीकरण शामिल हैं। रिपोर्ट सहकर्मी समीक्षित शोध का हवाला देती है जो दर्शाता है कि जलवायु परिवर्तन के कारण अत्यधिक गर्मी और तेज़ हो रहे भूमि उपयोग परिवर्तन का संयोजन उभयचर, पक्षी, स्तनधारी और सरीसृप सहित लगभग 8000 कशेरुक प्रजातियों को खतरे में डाल रहा है, जिनके हॉटस्पॉट दक्षिण एशिया में हैं।
भारत के संदर्भ में रिपोर्ट दर्ज करती है कि 2020 21 से 2024 25 के बीच लगभग 97000 हेक्टेयर वन भूमि को गैर वन उपयोग के लिए परिवर्तित किया गया, यह विचलन 26 राज्यों में बढ़ा है। 2026 संस्करण जलवायु जनित बाढ़, पर्यावरण शासन में कृत्रिम बुद्धिमत्ता की बढ़ती भूमिका, कुछ ज़िलों में जनसंख्या ह्रास के रुझानों तथा युवाओं में बढ़ती पर्यावरण चिंता पर भी केंद्रित है। विज्ञान एवं पर्यावरण केंद्र ने मज़बूत पर्यावरण प्रभाव आकलन अनुपालन, क्षरित पारिस्थितिकी तंत्रों की पुनर्स्थापना तथा राज्य योजना के साथ जलवायु कार्रवाई के समन्वय की माँग की है ताकि विकास के साथ साथ भारत सुरक्षित ग्रहीय सीमाओं के भीतर रह सके।
