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पाश्चात्य दर्शन: प्रमुख दार्शनिक और उनकी पद्धतियाँ MCQ - उत्तर सहित अभ्यास प्रश्न

RAS/RPSC तैयारी के लिए पाश्चात्य दर्शन: प्रमुख दार्शनिक और उनकी पद्धतियाँ के 64 प्रश्न हल करें।

अभ्यास प्रश्न

प्र.1प्लेटो के रिपब्लिक के चतुर्थ भाग में बताए गए प्रधान सद्गुणों के संदर्भ में कौन-सा युग्म सही मिलान है?

A न्याय: नगर और आत्मा का हर भाग अपना उचित काम करे और दूसरों के काम में दखल न दे
B प्रज्ञा: सहायक वर्ग द्वारा इस बात से जुड़ी सही मान्यताओं का संरक्षण कि किससे डरना चाहिए
C साहस: पूरे नगर के हित के बारे में शासक रक्षकों के पास मौजूद विवेकपूर्ण ज्ञान
D संयम: उत्पादक वर्ग का विशेष सद्गुण, क्योंकि केवल कामनात्मक इच्छाओं पर रोक चाहिए
व्याख्या

रिपब्लिक के चतुर्थ भाग में प्लेटो पहले सद्गुणों को व्यवस्थित नगर पर और फिर आत्मा पर लागू करते हैं। प्रज्ञा शासक तत्त्व से जुड़ती है, साहस उत्साही सहायक वर्ग से, संयम शासन के बारे में व्यापक सहमति है और न्याय वह दशा है जिसमें हर वर्ग या मानसिक भाग बिना दखल के अपना काम करता है।

प्र.2गांधी की न्यासिता की धारणा मुख्य रूप से क्या बताती है?

A गांधीवादी अर्थशास्त्र में श्रम और ग्राम-जीवन का कोई स्थान नहीं है
B संपत्ति का उपयोग केवल असीम निजी विलासिता के लिए होना चाहिए
C आर्थिक समानता केवल धनी लोगों से घृणा करके मिल सकती है
D धनी लोगों को अतिरिक्त संपत्ति समाज के कल्याण के लिए न्यासी की तरह रखनी चाहिए
व्याख्या

गांधी के नैतिक-आर्थिक विचार में न्यासिता का अर्थ है कि संपत्ति रखने वाले लोग स्वयं को पूर्ण मालिक नहीं, बल्कि न्यासी मानें। यह स्वार्थपूर्ण संचय के बजाय अहिंसक नैतिक जिम्मेदारी से समाज-कल्याण और असमानता में कमी की दिशा चाहता है।

प्र.3कौन-सा कथन सबसे अच्छी तरह बताता है कि प्लेटो का प्रधान सद्गुण-सिद्धांत उसके त्रिभागी मनोविज्ञान से क्यों जुड़ा है?

A यह सिद्धांत व्यक्ति के चरित्र और आदर्श नगर की संरचना के बीच किसी भी संबंध को नकारता है।
B आत्मा के तीन भाग प्रज्ञा और साहस मौजूद होने पर न्याय को अनावश्यक बना देते हैं।
C हर सद्गुण मानसिक या नागरिक व्यवस्था की उचित दशा से जुड़ता है: बुद्धि शासन करती है, उत्साह साथ देता है, कामना संयमित होती है और न्याय सभी भागों का समन्वय करता है।
D कामनात्मक भाग अकेले ही चारों सद्गुण रखता है, जब उसे संगीत और व्यायाम से प्रशिक्षित कर दिया जाए।
व्याख्या

प्लेटो का सद्गुण-सिद्धांत संरचनात्मक है। विवेकशील भाग प्रज्ञा के साथ शासन करने योग्य है, उत्साही भाग साहस के माध्यम से विवेक के निर्णय का साथ देता है, कामना को संयमित सहमति में लाया जाना चाहिए और न्याय सभी भागों की सही व्यवस्था का नाम है। यही ढाँचा आदर्श नगर में भी रखा जाता है।

प्र.4भगवद्गीता में निष्काम कर्म की नैतिक धारणा मुख्य रूप से व्यक्ति से क्या अपेक्षा करती है?

A केवल तभी कर्म करना जब निजी लाभ निश्चित हो
B नैतिक कर्तव्य से ऊपर कर्मकांड को मानना
C सभी कर्मों से बचना ताकि कोई कर्म पैदा ही न हो
D कर्म के फल से आसक्ति छोड़े हुए अपना कर्तव्य करना
व्याख्या

निष्काम कर्म का अर्थ इच्छा-रहित या अनासक्त कर्म है। गीता के कर्मयोग में व्यक्ति से अपेक्षा है कि वह अपना आवश्यक कर्तव्य करे, लेकिन कर्म के फल को अपनी प्रेरणा न बनाए। इसलिए यह स्वार्थपूर्ण कर्म और पूर्ण अकर्मण्यता, दोनों से अलग है।

प्र.5पुरुषार्थ-व्यवस्था में मोक्ष की कौन-सी व्याख्या सबसे सटीक है?

A यह बंधन से मुक्ति है, जिसे सामान्यतः सर्वोच्च आध्यात्मिक लक्ष्य माना जाता है
B यह अर्थ के समान है, क्योंकि दोनों का मतलब धन और शक्ति अर्जित करना है
C यह इंद्रिय-सुख को स्वतंत्र अंतिम लक्ष्य मानकर उसका पीछा करना है
D यह केवल गृहस्थ आश्रम तक सीमित अनिवार्य सामाजिक कर्तव्य है
व्याख्या

पुरुषार्थ सिद्धांत में धर्म जीवन को मर्यादा देता है, अर्थ भौतिक साधन उपलब्ध कराता है, काम उचित इच्छा से जुड़ा है और मोक्ष बंधन से मुक्ति की ओर संकेत करता है। परीक्षा में अक्सर पहले तीन लौकिक लक्ष्यों और मुक्ति देने वाले लक्ष्य के रूप में मोक्ष के अंतर को पूछा जाता है।

आपने 64 में से 5 नमूना प्रश्न देख लिए हैं

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और प्रश्न

6जैन दर्शन में अनेकांतवाद मुख्य रूप से क्या सिखाता है?

Aहर परिस्थिति में ज्ञान असंभव है
Bवास्तविकता अनेक पक्षों वाली है और कोई एक निरपेक्ष कथन उसे पूरी तरह समाप्त नहीं कर देता
Cकेवल भौतिक वस्तुएं हैं और आत्मा असत्य है
Dमुक्ति के लिए सभी नैतिक व्रत अनावश्यक हैं

7जैन धर्म में तीन रत्न या त्रिरत्न को सही रूप में कौन-सा समूह बताता है?

Aयज्ञ, कर्मकांड और दान
Bसम्यक आजीविका, सम्यक प्रयास और सम्यक स्मृति
Cसम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र
Dसत्य, अहिंसा और सत्याग्रह

8भगवद्गीता की नैतिक दृष्टि में निष्काम कर्म को सबसे ठीक किस कथन से समझाया जाता है?

Aअपने कर्तव्य का पालन स्वार्थपूर्ण इच्छा और फल के मोह के बिना करना
Bसामाजिक कर्तव्य छोड़कर केवल निजी ध्यान में लग जाना
Cकेवल तब कर्म करना जब निजी लाभ निश्चित हो
Dहर कर्म बंधन पैदा करता है, इसलिए सभी कर्म छोड़ देना

9कांट की निरपेक्ष आज्ञा के दो केंद्रीय रूपों को कौन-सा युग्म सही ढंग से बताता है?

Aकेवल ऐसे संकल्प पर कर्म करो जिसे सार्वभौमिक बनाया जा सके; मानवता को हमेशा साध्य मानो, मात्र साधन कभी नहीं।
Bकुल सुख को अधिकतम करो; पीड़ा को अंतिम लक्ष्य के रूप में पूरी तरह टालो।
Cजो अपने लिए लाभकारी हो वही चुनो; जो कर्तव्य निजी सुख घटाएँ उन्हें अस्वीकार करो।
Dकेवल भय पैदा करने के लिए दंड दो; हर अपराधी को उपचार से सुधारो।

10बौद्ध धर्म में चार आर्य सत्यों का मूल क्रम कौन-सा सही है?

Aआत्मा, ईश्वर, कर्मकांड और स्वर्ग
Bकर्म, फल, त्याग और भक्ति
Cश्रद्धा, ज्ञान, आचरण और मुक्ति
Dदुःख, तृष्णा में उसका कारण, उसका निरोध और निरोध तक ले जाने वाला मार्ग

11कर्म-उपयोगितावाद के विरुद्ध सामान्यतः कौन-सी आलोचना की जाती है?

Aयह परिणामों को कोई भूमिका ही नहीं देता।
Bयह मानता ही नहीं कि सुख का कोई नैतिक महत्व है।
Cयदि कोई कर्म कुल उपयोगिता को अधिकतम करता हो, तो यह सामान्य न्याय का उल्लंघन करने वाले कर्मों को भी अनुमति दे सकता है।
Dयह हर नैतिक नियम को परिणाम की परवाह किए बिना पूर्णतः बाध्यकारी मानता है।

12नैतिक सुखवाद में अंतर्निहित मूल्य के बारे में केंद्रीय दावा किस कथन में सबसे ठीक व्यक्त होता है?

Aकेवल कर्तव्य-बोध से किए गए कर्मों का ही अंतर्निहित नैतिक मूल्य होता है।
Bदंड इसलिए उचित है कि अपराधी दोष के अनुपात में कष्ट पाने का अधिकारी है।
Cनैतिक नियम का ज्ञान इस कसौटी से होता है कि कोई संकल्प सार्वभौमिक बनाया जा सकता है या नहीं।
Dकेवल सुख अपने-आप में शुभ है, और केवल पीड़ा अपने-आप में अशुभ है।

13इच्छा-स्वातंत्र्य की बहस में कौन-सा मत मानता है कि किसी व्यक्ति का कर्म कारणों से निर्धारित होने पर भी स्वतंत्र हो सकता है, बशर्ते वह बाहरी दबाव के बजाय उसी व्यक्ति के अपने कारणों, इच्छाओं या चरित्र से निकले?

Aकठोर नियतिवाद
Bभाग्यवाद
Cसंगततावाद
Dस्वतंत्र इच्छा संबंधी स्वातंत्र्यवाद

14मूल भारतीय दर्शन में ऋत और कर्म का सबसे सही अंतर कौन-सा है?

Aऋत और कर्म दोनों अग्नि-यज्ञ के ठीक-ठीक पर्याय हैं
Bऋत विश्व और नैतिक व्यवस्था से जुड़ा है, जबकि कर्म क्रिया और उसके नैतिक परिणामों से जुड़ा है
Cऋत पुनर्जन्म का सिद्धांत है, जबकि कर्म मानव जीवन के चार लक्ष्यों की सूची है
Dऋत का अर्थ मुक्ति है, जबकि कर्म का अर्थ केवल आर्थिक समृद्धि है

15परीक्षा की दृष्टि से वैदिक ‘ऋत’ की दार्शनिक संकल्पना को कौन-सा कथन सबसे ठीक समझाता है?

Aयह विश्व, यज्ञ और नैतिक जीवन को संभालने वाली व्यवस्था और नियमितता का सिद्धांत है
Bयह धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष जैसे चार मानव-लक्ष्यों को बताता है
Cयह केवल यज्ञ के बाद धन-दान से मिलने वाला व्यक्तिगत पुण्य है
Dयह उस उपनिषदिक शाखा का नाम है जो कारण-फल और नैतिक जिम्मेदारी को नकारती है

सामाजिक विज्ञान — भाग I (माध्यमिक/उच्च माध्यमिक) में और विषय

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