सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए राजस्थान सरकार की 2007 की अधिसूचना को खारिज कर दिया। इस अधिसूचना में केवल राजस्थान में उत्पादित वस्तुओं को VAT (मूल्य वर्धित कर) से छूट दी गई थी, जबकि अन्य राज्यों में बनी समान वस्तुओं पर VAT लगाया जा रहा था। न्यायालय ने माना कि यह भेदभावपूर्ण व्यवहार संविधान के अनुच्छेद 304(a) का उल्लंघन करता है।

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 304(a) राज्यों को अन्य राज्यों से आयातित वस्तुओं पर भेदभावपूर्ण कर लगाने से रोकता है। इसके अनुसार, कोई राज्य अन्य राज्यों या केंद्र शासित प्रदेशों से आयातित वस्तुओं पर वैसा कर लगा सकता है जैसा उस राज्य में निर्मित या उत्पादित समान वस्तुओं पर लगता है, लेकिन आयातित वस्तुओं और स्थानीय रूप से निर्मित या उत्पादित वस्तुओं के बीच भेदभाव नहीं किया जा सकता। मतलब यह है कि यदि कोई राज्य वस्तुओं पर कर लगाता है, तो वह कर राज्य में बनी वस्तुओं और बाहर से आई वस्तुओं, दोनों पर समान रूप से लागू होना चाहिए। केवल स्थानीय उत्पादों को दी गई अधिमान्य छूट भेदभाव मानी जाएगी।

राजस्थान की 2007 की अधिसूचना को अन्य राज्यों के व्यापारियों ने चुनौती दी थी। उनका कहना था कि स्थानीय रूप से उत्पादित वस्तुओं को VAT छूट के कारण प्रभावी रूप से सब्सिडी मिल रही थी, जिससे वे प्रतिस्पर्धा में नुकसान झेल रहे थे। सुप्रीम कोर्ट ने अधिसूचना की जांच करते हुए पाया कि यह अनुच्छेद 304(a) से सीधे टकराती है।

इस फैसले का महत्व व्यापक है। यह भारत के भीतर एकीकृत आंतरिक बाजार के संवैधानिक सिद्धांत की पुष्टि करता है और राज्यों को कर नीति के जरिए अन्य राज्यों की वस्तुओं के खिलाफ आर्थिक बाधाएं खड़ी करने से रोकता है।