भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने राजस्थान में बड़े पैमाने पर हो रहे अवैध नदी बालू खनन और परिवहन के आरोपों पर केंद्र सरकार और राजस्थान सरकार को नोटिस जारी किया। न्यायालय ने नियामक कमजोरियों, संगठित बालू तस्करी और नदी तट के कटाव, जलीय जैव-विविधता को नुकसान तथा भूजल स्तर में गिरावट जैसे पर्यावरणीय नुकसानों पर ध्यान दिलाया। खान एवं खनिज अधिनियम 1957 के तहत बालू 'लघु खनिज' है और इसका नियंत्रण राज्य सरकारों के पास है। न्यायालय ने 2016 की सतत बालू खनन प्रबंधन दिशा-निर्देशों के पालन पर जोर दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने अवैध बालू खनन पर केंद्र और राजस्थान को नोटिस जारी किया
सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान में व्यापक अवैध बालू खनन पर केंद्र और राज्य सरकार को नोटिस जारी किया तथा पर्यावरणीय नुकसान और नियामक विफलताओं को रेखांकित किया।
मुख्य तथ्य
- सुप्रीम कोर्ट ने अवैध बालू खनन पर केंद्र और राजस्थान को नोटिस जारी किया।
- राजस्थान की नदियों में बड़े पैमाने पर हो रहे अवैध बालू खनन का मुद्दा उठाया गया।
- याचिका में अनियमित खनन से होने वाले पर्यावरणीय नुकसान को रेखांकित किया गया।
- राज्य खनन प्राधिकरणों की नियामक विफलताओं पर प्रकाश डाला गया।
- इस मामले से खनन नियमों का कड़ा प्रवर्तन हो सकता है।
- बालू खनन राजस्थान में पर्यावरण और शासन से जुड़ी एक प्रमुख चुनौती है।
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किस अधिनियम के तहत रेत को गौण खनिज के रूप में वर्गीकृत किया गया है, जिससे इसकी नियामक निगरानी राज्य सरकारों के पास होती है?
रेत को खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1957 के तहत गौण खनिज के रूप में वर्गीकृत किया गया है, इसलिए इसके विनियमन की जिम्मेदारी केंद्र सरकार के बजाय राज्य सरकारों के पास होती है।
स्रोत: समाचार स्रोत
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
सुप्रीम कोर्ट ने बालू खनन पर केंद्र और राजस्थान को नोटिस क्यों जारी किया?
सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिका पर केंद्र और राजस्थान सरकार को नोटिस जारी किया, जिसमें राजस्थान की नदियों में बड़े पैमाने पर हो रहे अवैध बालू खनन का मुद्दा उठाया गया था। कोर्ट ने अनियमित उत्खनन से होने वाले गंभीर पर्यावरणीय नुकसान और अवैध खनन रोकने में राज्य खनन प्राधिकरणों की नियामक विफलताओं पर ध्यान दिलाया।
राजस्थान की नदियों में अवैध बालू खनन के पर्यावरणीय परिणाम क्या हैं?
राजस्थान की नदियों, विशेष रूप से चंबल, बनास और माही, में अवैध बालू खनन से नदी तल का गंभीर कटाव होता है, जलीय पारिस्थितिकी तंत्र बाधित होता है, भूजल स्तर गिरता है, नदी किनारे अस्थिर होते हैं और बाढ़ का खतरा बढ़ता है। इससे चंबल क्षेत्र में घड़ियाल जैसी लुप्तप्राय प्रजातियों के प्राकृतिक आवास भी नष्ट होते हैं।
भारत में बालू खनन को कौन-सा कानूनी ढाँचा नियंत्रित करता है और राज्यों की क्या भूमिका है?
बालू, खान एवं खनिज (विकास एवं विनियमन) अधिनियम, 1957 (MMDR अधिनियम) के तहत एक लघु खनिज है। लघु खनिजों के उत्खनन के विनियमन, पट्टा जारी करने और खनन नियमों के प्रवर्तन का प्राथमिक अधिकार राज्यों को है। खान मंत्रालय के बालू खनन ढाँचे (2018, 2020 में संशोधित) में दिशानिर्देश दिए गए हैं, लेकिन उनका प्रवर्तन राज्य की जिम्मेदारी है।
राजस्थान में बालू खनन को एक प्रमुख शासन चुनौती क्यों माना जाता है?
राजस्थान में बालू खनन एक शासन चुनौती है क्योंकि यह अवैध ऑपरेटरों, राजनीतिक संरक्षण और कमजोर प्रवर्तन के गठजोड़ में चलता है। भारत में अवैध बालू खनन की सबसे अधिक घटनाएँ राजस्थान में दर्ज होती हैं। सुप्रीम कोर्ट के बार-बार आदेशों, NGT निर्देशों और राज्य सरकार की कार्रवाइयों का प्रभाव सीमित रहा है।
सुप्रीम कोर्ट का नोटिस राजस्थान में नियामक सुधार की दिशा में कौन-से कदमों को गति दे सकता है?
सुप्रीम कोर्ट का नोटिस खनन नियमों के कड़े प्रवर्तन, बालू उत्खनन स्थलों की रीयल-टाइम डिजिटल निगरानी, अवैध खनन संचालकों पर बढ़ी हुई दंड राशि और संभवतः एक समर्पित निगरानी समिति के गठन का रास्ता खोल सकता है। यह राज्य को बालू खनन ढाँचे के अनुसार व्यापक जिला सर्वेक्षण रिपोर्ट (DSR) आधारित बालू खनन प्रबंधन योजना बनाने के लिए भी प्रेरित कर सकता है।
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