प्रोजेक्ट गोडावण (ग्रेट इंडियन बस्टर्ड) भारत के वन्यजीव संरक्षण प्रयासों का अहम उदाहरण है। राजस्थान के संरक्षण प्रजनन केंद्र में दो नए चूजों का जन्म इस कार्यक्रम के लिए बड़ी उपलब्धि है। इनमें एक चूजा प्राकृतिक प्रजनन से और दूसरा कृत्रिम गर्भाधान से जन्मा, जिससे बंदी अवस्था में रखे गए गोडावण की कुल संख्या 70 हो गई। वन्य अवस्था में इस पक्षी की संख्या 150-200 से भी कम मानी जाती है और इसका मुख्य फैलाव राजस्थान और गुजरात में बचा है। 1982 के मुकाबले इसकी संख्या 80% से अधिक घट चुकी है। परीक्षा में यह मामला संकटग्रस्त प्रजाति संरक्षण, जैव विविधता और संरक्षण में विज्ञान-तकनीक के उपयोग का समसामयिक उदाहरण देता है।

गोडावण को आईयूसीएन रेड लिस्ट में गंभीर रूप से संकटग्रस्त श्रेणी में रखा गया है। इसकी घटती आबादी के पीछे कृषि विस्तार, बुनियादी ढांचे के विकास से आवास का नुकसान, बिजली लाइनों से टक्कर, शिकार और प्रजनन स्थलों पर बाधा जैसी चुनौतियां बताई जाती हैं। कृत्रिम गर्भाधान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वन्य आबादी बहुत कम और बिखरी हुई है; ऐसे में बंदी प्रजनन से सुरक्षित आबादी तैयार करने और आनुवंशिक विविधता बनाए रखने में मदद मिल सकती है। इस साल बंदी प्रजनन से जन्मे कुछ चूजों को नियंत्रित तरीके से जंगल में छोड़ने की संभावना भी संरक्षण के अगले कठिन चरण को दिखाती है।

ब्यावर में सूचना का अधिकार संग्रहालय की नींव रखे जाने का उल्लेख भी महत्वपूर्ण है। ब्यावर को सूचना का अधिकार आंदोलन की जन्मभूमि से जोड़ा जाता है। इसलिए यह तथ्य शासन-सुधार, पारदर्शिता, जवाबदेही और नागरिक अधिकारों की दृष्टि से उपयोगी है। RAS और UPSC की तैयारी में इस विषय को दो हिस्सों में पढ़ना चाहिए: पहला, गोडावण संरक्षण का पर्यावरणीय और तकनीकी पक्ष; दूसरा, ब्यावर और सूचना का अधिकार आंदोलन का शासन-संबंधी पक्ष।