प्रकाशित: 6 मार्च 2026समाचार स्रोतराजस्थान
राजस्थान विधानसभा ने स्थानीय निकाय चुनावों के लिए 30 साल पुरानी दो-बच्चा नीति समाप्त की
राजस्थान विधानसभा ने राजस्थान पंचायती राज (संशोधन) विधेयक 2026 और राजस्थान नगरपालिका (संशोधन) विधेयक 2026 पारित किया। इन विधेयकों ने 1995 में तत्कालीन मुख्यमंत्री भैरोंसिंह शेखावत की सरकार द्वारा लागू उस प्रावधान को समाप्त कर दिया, जिसके तहत दो से अधिक बच्चों वाले उम्मीदवारों को पंचायती राज और शहरी स्थानीय निकाय चुनाव लड़ने से रोका जाता था।
इस संशोधन से वार्ड पंच, सरपंच, पंचायत समिति सदस्य, जिला परिषद सदस्य, प्रधान और जिला प्रमुख के पदों पर परिवार के आकार के आधार पर अयोग्यता हटा दी गई है। साथ ही विधेयकों में कुष्ठ रोग से पीड़ित व्यक्तियों को चुनाव लड़ने से रोकने वाली धारा भी हटाई गई, जिससे राजस्थान का चुनाव कानून दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम 2016 और आधुनिक सार्वजनिक स्वास्थ्य मानकों के अनुरूप हो गया।
राज्य अधिकारियों ने तर्क दिया कि तीन दशक पुराना यह नियम भेदभावपूर्ण, पुराना और जनसंख्या नियंत्रण के साधन के रूप में अप्रभावी था, क्योंकि राजस्थान की कुल प्रजनन दर (TFR) पहले ही काफी गिर चुकी है। ये संशोधन अब राजस्थान विधानसभा की सूची में अधिनियम संख्या 6/2026 और अधिनियम संख्या 7/2026 के रूप में दर्ज हैं; पंचायती राज संशोधन में लिखा है कि यह तुरंत प्रभावी होगा।
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जुड़ा प्रश्नआसान
राजस्थान विधानसभा ने कितने वर्षों से लागू दो बच्चों का मानदंड समाप्त किया?
व्याख्या · सही उत्तर Dराजस्थान ने स्थानीय निकाय चुनावों में लागू 30 वर्ष पुराना दो-बच्चों का मानदंड समाप्त कर दिया।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
राजस्थान में स्थानीय निकाय चुनावों के लिए दो-बच्चा नीति क्या थी और यह विवादास्पद क्यों थी?
1995 में बनी दो-बच्चा नीति दो से अधिक बच्चों वाले उम्मीदवारों को पंचायती राज और नगरपालिका चुनाव लड़ने से रोकती थी। आलोचकों का कहना था कि यह गरीब और ग्रामीण उम्मीदवारों पर असमान असर डालती थी, प्रजनन अधिकारों का उल्लंघन करती थी और बड़े परिवारों वाले समुदायों के मतदाताओं को प्रतिनिधित्व से वंचित करती थी।
राजस्थान में दो-बच्चा नीति हटाने के लिए कौन से कानून संशोधित किए गए?
राजस्थान विधानसभा ने राजस्थान पंचायती राज अधिनियम और राजस्थान नगरपालिका कानूनों में संशोधन विधेयक पारित किए, जिनसे 1995 से चली आ रही दो-बच्चा नीति की शर्त हटा दी गई। इन्हीं संशोधनों से कुष्ठ रोग से पीड़ित व्यक्तियों की स्थानीय निकाय चुनाव में अयोग्यता भी समाप्त की गई।
चुनावों के लिए दो-बच्चा नीति पर सर्वोच्च न्यायालय ने क्या कहा था?
सर्वोच्च न्यायालय ने पहले स्थानीय निकाय चुनावों के लिए राज्य स्तरीय दो-बच्चा नीतियों को संवैधानिक रूप से वैध माना था और कहा था कि उम्मीदवारों की पात्रता तय करने का अधिकार राज्यों के पास है। लेकिन न्यायालय के फैसले ने राज्यों को विधायी संशोधन से ऐसी नीतियां अपनी इच्छा से हटाने से नहीं रोका, और राजस्थान ने अब यही किया है।
कुष्ठ रोग के आधार पर अयोग्यता हटाना क्यों महत्वपूर्ण है?
कुष्ठ रोग से पीड़ितों को चुनाव लड़ने से रोकना भेदभावपूर्ण था और पुरानी सामाजिक धारणा पर आधारित था, क्योंकि कुष्ठ रोग अब उपचार योग्य है और सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए खतरा नहीं है। यह संशोधन राजस्थान के स्थानीय निकाय कानूनों को सभी नागरिकों की समानता और गरिमा की संवैधानिक गारंटी के अनुरूप बनाता है।
दो-बच्चा नीति हटाने से जमीनी स्तर पर लोकतांत्रिक भागीदारी पर क्या असर होगा?
इस नीति को हटाने से पात्र उम्मीदवारों का दायरा बढ़ेगा, खासकर ग्रामीण और आदिवासी समुदायों में जहाँ बड़े परिवार आम हैं। इससे पंचायती राज संस्थाओं और नगरीय स्थानीय निकायों में अधिक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित होगा और जमीनी शासन में पात्रता से जुड़ी भेदभावपूर्ण रुकावटें दूर होंगी।