बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी ने झारखंड के मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक के साथ 5 वर्षीय समझौता ज्ञापन किया है। इसका उद्देश्य गंभीर रूप से संकटग्रस्त गिद्ध प्रजातियों, खासकर ओरिएंटल व्हाइट-बैक्ड गिद्ध और लंबी चोंच वाले गिद्ध, के संरक्षण को मजबूत करना है। समझौते में वैज्ञानिक प्रजनन, निगरानी, प्रशिक्षण और लंबी अवधि के संरक्षण पर काम होगा। कार्यक्रम वित्त वर्ष 2025-26 से शुरू माना गया है और झारखंड में रांची के पास मुटा स्थित गिद्ध संरक्षण और प्रजनन केंद्र के संचालन को भी इससे बल मिलने की उम्मीद है।

परीक्षा में इससे पर्यावरण, जैव-विविधता, वन्यजीव संरक्षण कानून और सार्वजनिक स्वास्थ्य पर प्रश्न बन सकते हैं। गिद्ध शवभक्षी पक्षी हैं। वे पशु शवों को तेजी से साफ करते हैं, जिससे रोग फैलने की आशंका घटती है और पारिस्थितिकी तंत्र में पोषक तत्वों का चक्र चलता रहता है। भारत में गिद्धों की संख्या में भारी गिरावट का एक बड़ा कारण पशु-चिकित्सा में इस्तेमाल होने वाली डिक्लोफेनाक दवा रही है। ऐसे शवों को खाने पर गिद्धों में गुर्दे की गंभीर समस्या हो सकती है। आवास की हानि, विषाक्तता और बिजली लाइनों से खतरा भी महत्त्वपूर्ण मुद्दे हैं।

स्टैटिक जीके के लिए विद्यार्थी ओरिएंटल व्हाइट-बैक्ड गिद्ध, लंबी चोंच वाले गिद्ध और पतली चोंच वाले गिद्ध जैसी प्रजातियों की संरक्षण-स्थिति, गिद्ध सुरक्षित क्षेत्र, जटायु संरक्षण प्रजनन केंद्र और वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की अनुसूची I जैसे बिंदु जोड़ सकते हैं। RAS और UPSC जैसी परीक्षाओं में यह तथ्यात्मक प्रारंभिक परीक्षा प्रश्नों, पर्यावरणीय शासन, जैव-विविधता संरक्षण और शवभक्षी प्रजातियों की सार्वजनिक स्वास्थ्य में भूमिका पर छोटे मुख्य परीक्षा उत्तरों के लिए उपयोगी है।