प्रकाशित: 10 मार्च 2026Down to Earth / Parliamentअर्थव्यवस्था
भारत दुर्लभ मृदा की घरेलू आपूर्ति श्रृंखला मजबूत कर रहा है
भारत चीनी दुर्लभ मृदा आयात पर निर्भरता कम करने और देश में दुर्लभ मृदा की मजबूत आपूर्ति श्रृंखला तैयार करने की दिशा में निर्णायक कदम उठा रहा है। केंद्रीय बजट 2026-27 में खनिज-समृद्ध तटीय राज्यों को दुर्लभ मृदा गलियारे स्थापित करने के लिए विशेष समर्थन की घोषणा की गई, जिसमें खनन, प्रसंस्करण और अनुसंधान शामिल हैं।
दुर्लभ मृदा तत्व (REE) 17 धातुओं का समूह हैं — जैसे सेरियम, लैंथेनम, नियोडिमियम, डिस्प्रोसियम — जो इलेक्ट्रिक वाहनों (EV), रक्षा इलेक्ट्रॉनिक्स, पवन टरबाइन, स्मार्टफोन और उन्नत सैन्य प्रणालियों के लिए अनिवार्य हैं। चीन वैश्विक दुर्लभ मृदा खनन का लगभग 60-70% और प्रसंस्करण क्षमता का 85% से अधिक नियंत्रित करता है।
भारत के पास विश्व का पाँचवाँ सबसे बड़ा दुर्लभ मृदा भंडार है, मुख्यतः पूर्वी और पश्चिमी तटीय पट्टियों में — ओडिशा, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और केरल में। इन भंडारों के बावजूद भारत ऐतिहासिक रूप से कच्चे मोनाजाइट रेत का निर्यात और प्रसंस्कृत दुर्लभ मृदा यौगिकों का आयात करता रहा है।
प्रस्तावित दुर्लभ मृदा गलियारे खनन से लेकर पृथक्करण, प्रसंस्करण और उच्च-तकनीक उद्योगों के लिए दुर्लभ मृदा यौगिकों के निर्माण तक पूरी घरेलू क्षमता विकसित करेंगे। यह आत्मनिर्भर भारत, राष्ट्रीय महत्वपूर्ण खनिज मिशन और रक्षा व EV विनिर्माण के स्वदेशीकरण के लक्ष्यों के अनुरूप है। भारत-चीन भू-राजनीतिक तनाव और कोविड के बाद वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में विविधता लाने की जरूरत को देखते हुए यह रणनीतिक रूप से भी अनिवार्य है।
0मेन्स दृष्टिकोण
प्रश्न: चीन के प्रभुत्व के बीच घरेलू दुर्लभ मृदा आपूर्ति श्रृंखला के लिए भारत की रणनीति का मूल्यांकन कीजिए।
उत्तर (50 शब्द):
बजट 2026-27 में खनिज-समृद्ध तटीय राज्यों के सहयोग से खनन, प्रसंस्करण और अनुसंधान के लिए दुर्लभ मृदा गलियारे प्रस्तावित हैं। ओडिशा, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, केरल में विश्व का पाँचवाँ भंडार होने पर भी भारत आयात पर निर्भर है; चीन वैश्विक खनन का 60-70% और प्रसंस्करण 85% नियंत्रित करता है। यह पहल आत्मनिर्भर भारत और राष्ट्रीय महत्वपूर्ण खनिज मिशन को बढ़ावा देती है।
6-अक्ष वर्गीकरण
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जुड़ा प्रश्नआसान
कौन-सा देश वैश्विक दुर्लभ मृदा तत्व प्रसंस्करण में 85% से अधिक क्षमता रखता है, जिसके कारण भारत अपनी आपूर्ति शृंखला विकसित कर रहा है?
व्याख्या · सही उत्तर Dसही उत्तर चीन है, क्योंकि दुर्लभ मृदा तत्वों के परिष्करण और प्रसंस्करण में चीन का दबदबा है और कई आकलन उसके नियंत्रण को लगभग 85% या उससे अधिक बताते हैं। भारत के लिए यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि दुर्लभ मृदा तत्व इलेक्ट्रिक वाहनों, रक्षा इलेक्ट्रॉनिक्स, स्वच्छ ऊर्जा उपकरणों और उन्नत विनिर्माण के लिए जरूरी हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भारत अपनी घरेलू दुर्लभ मृदा आपूर्ति श्रृंखला क्यों बना रहा है और बजट 2026-27 में क्या घोषणा की गई?
भारत **चीन से दुर्लभ मृदा आयात** पर निर्भरता कम कर रहा है (चीन वैश्विक REE खनन का 60-70% और प्रसंस्करण का 85%+ नियंत्रित करता है)। **बजट 2026-27** में **खनिज-समृद्ध तटीय राज्यों** को ऐसे **दुर्लभ मृदा गलियारे** स्थापित करने में सहायता देने की घोषणा की गई, जिनमें खनन, प्रसंस्करण और अनुसंधान शामिल होंगे — यह **आत्मनिर्भर भारत** और **राष्ट्रीय महत्वपूर्ण खनिज मिशन** के अनुरूप है।
दुर्लभ मृदा तत्व क्या हैं और ये रणनीतिक रूप से क्यों महत्त्वपूर्ण हैं?
**दुर्लभ मृदा तत्व (REE)** 17 धातुओं (सेरियम, लैंथेनम, नियोडिमियम, डिस्प्रोसियम आदि) का समूह है जो **इलेक्ट्रिक वाहनों, रक्षा इलेक्ट्रॉनिक्स, पवन टरबाइन और स्मार्टफोन** के लिए अनिवार्य हैं। **वैश्विक REE आपूर्ति पर चीन का वर्चस्व** इसे भू-राजनीतिक दृष्टि से कमज़ोर कड़ी बना देता है।
भारत के दुर्लभ मृदा भंडार कहाँ स्थित हैं?
भारत के पास **विश्व का 5वाँ सबसे बड़ा दुर्लभ मृदा भंडार** है, मुख्यतः **पूर्वी और पश्चिमी तटीय पट्टियों** में — **ओडिशा, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और केरल** में। भंडार के बावजूद भारत ऐतिहासिक रूप से कच्चे मोनाजाइट का निर्यात और प्रसंस्कृत REE का आयात करता रहा।
राष्ट्रीय महत्वपूर्ण खनिज मिशन क्या है?
**राष्ट्रीय क्रिटिकल मिनरल्स मिशन** स्वच्छ ऊर्जा, रक्षा और उन्नत प्रौद्योगिकी के लिए जरूरी खनिजों — दुर्लभ मृदा, लिथियम, कोबाल्ट, निकल — की घरेलू उपलब्धता सुनिश्चित करने की भारत की पहल है।
दुर्लभ मृदा की आपूर्ति शृंखला का विकास भारत के EV और रक्षा लक्ष्यों से कैसे जुड़ा है?
**नियोडिमियम और डिस्प्रोसियम** जैसे दुर्लभ मृदा तत्व **EV मोटर और रक्षा प्रणालियों में स्थायी चुम्बकों** के लिए आवश्यक हैं। देश में REE का प्रसंस्करण EV और रक्षा स्वदेशीकरण के लिए **मेक इन इंडिया** को मजबूत करेगा और चीन पर निर्भरता कम करेगा।