जनवरी 2026 में नीति आयोग-टेरी रिपोर्ट ने भारत के ई-कचरा क्षेत्र को चक्रीय अर्थव्यवस्था के एक बड़े अवसर के रूप में बताया। रिपोर्ट के अनुसार भारत के ई-कचरे का वार्षिक आर्थिक मूल्य करीब 51,000 करोड़ रुपये है। इसका लगभग 60% हिस्सा तकनीकी रूप से वापस निकाला जा सकता है, यानी संभावित रूप से करीब 30,600 करोड़ रुपये का मूल्य उपयोगी संसाधन बन सकता है। इसके बावजूद मौजूदा व्यवस्था इस संभावित मूल्य का केवल 18% ही हासिल कर रही है। यह अंतर बताता है कि ई-कचरा सिर्फ पर्यावरणीय समस्या नहीं, बल्कि संसाधन, उद्योग और शासन से जुड़ा आर्थिक मुद्दा भी है।

ई-कचरे में मोबाइल, कंप्यूटर, टीवी, घरेलू उपकरण और अन्य इलेक्ट्रॉनिक सामानों से निकले धातु, प्लास्टिक, कांच और खतरनाक पदार्थ शामिल होते हैं। इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में सोना, चांदी, प्लैटिनम, पैलेडियम, लिथियम, कोबाल्ट और दुर्लभ मृदा तत्व जैसे मूल्यवान पदार्थ मिल सकते हैं। अगर इनका सुरक्षित और औपचारिक प्रसंस्करण हो, तो आयात-निर्भर कच्चे माल पर दबाव घट सकता है और प्रदूषण भी कम हो सकता है। लेकिन अनौपचारिक प्रसंस्करण में कम वसूली, स्वास्थ्य जोखिम और मिट्टी-पानी के प्रदूषण जैसी समस्याएं बनी रहती हैं।

ई-कचरा प्रबंधन नियम और विस्तारित उत्पादक दायित्व, चक्रीय अर्थव्यवस्था को लागू करने के प्रमुख उपकरण हैं। 2026 की नीति आयोग-टेरी रिपोर्ट और पीआईबी सूचना ने ई-कचरा और लिथियम-आयन बैटरी स्क्रैप के लिए बुनियादी ढांचा, क्षेत्र को औपचारिक बनाने, विस्तारित उत्पादक दायित्व ढांचे को मजबूत करने और राजस्व क्षमता बढ़ाने की सिफारिशों पर ज़ोर दिया। भारत में ई-कचरा 2024 के 61.9 लाख मीट्रिक टन से 2030 तक 1.4 करोड़ मीट्रिक टन तक पहुंचने का अनुमान है। इसलिए स्टैटिक जीके में चक्रीय अर्थव्यवस्था, ई-कचरा प्रबंधन नियम, विस्तारित उत्पादक दायित्व और संसाधन दक्षता को इस करेंट अफ़ेयर्स से जोड़कर पढ़ना चाहिए।