प्रकाशित: 24 मार्च 2026DD News / LiveLawराजव्यवस्था
राज्यसभा ने ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक 2026 पारित किया, स्व-पहचान संबंधी खंड हटाया
राज्यसभा ने 25 मार्च 2026 को ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026 पारित किया — इससे एक दिन पहले 24 मार्च को लोकसभा इसे पारित कर चुकी थी। यह विधेयक मूल ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 में संशोधन करता है।
संशोधन का सबसे महत्वपूर्ण बदलाव 2019 अधिनियम से स्व-पहचान खंड को हटाना है। 2019 अधिनियम के तहत कोई भी व्यक्ति अपनी स्व-घोषित लिंग पहचान के आधार पर ट्रांसजेंडर प्रमाणपत्र के लिए आवेदन कर सकता था। संशोधन के बाद अब जिला स्तरीय स्क्रीनिंग समिति द्वारा चिकित्सा जांच अनिवार्य होगी।
संशोधित विधेयक 'ट्रांसजेंडर व्यक्ति' की परिभाषा में किन्नर, हिजड़ा, अरावनी और जोगता जैसी सामाजिक-सांस्कृतिक पहचानों को स्पष्ट रूप से शामिल करता है। हालांकि, आलोचकों का तर्क है कि स्व-पहचान हटाना सर्वोच्च न्यायालय के NALSA निर्णय (2014) के विरुद्ध है, जिसमें अनुच्छेद 21 के तहत लिंग स्व-पहचान को मौलिक अधिकार घोषित किया गया था।
एमनेस्टी इंटरनेशनल सहित मानवाधिकार संगठनों ने इस संशोधन को भारत में ट्रांसजेंडर अधिकारों के लिए "पीछे की ओर बड़ा कदम" बताया। विपक्ष ने तर्क दिया कि लिंग पहचान प्रमाणपत्र के लिए चिकित्सा जांच अनिवार्य करना शारीरिक स्वायत्तता का उल्लंघन है। विधेयक के समर्थकों का कहना है कि नई परिभाषा जमीनी स्तर की सामाजिक-सांस्कृतिक वास्तविकताओं को बेहतर ढंग से दर्शाती है।
0मेन्स दृष्टिकोण
प्रश्न: सर्वोच्च न्यायालय के एनएएलएसए निर्णय एवं अनुच्छेद 21 के आलोक में ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक 2026 की आलोचनात्मक परीक्षा कीजिए।
उत्तर (50 शब्द):
राज्यसभा ने 25 मार्च 2026 को, लोकसभा के एक दिन बाद, संशोधन विधेयक पारित किया। यह स्व-पहचान हटाता है, जिला-स्तरीय चिकित्सा जांच अनिवार्य करता है और किन्नर, हिजड़ा, अरावनी, जोगता पहचानें जोड़ता है। एमनेस्टी सहित आलोचकों का तर्क है कि यह 2014 के एनएएलएसए फैसले तथा अनुच्छेद 21 के मौलिक अधिकार के विपरीत है।
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जुड़ा प्रश्नमध्यम
मार्च 2026 में संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक 2026, मूल 2019 अधिनियम से कौन-सा प्रमुख प्रावधान हटाता है?
व्याख्या · सही उत्तर Bसंशोधन विधेयक 2026 में स्व-पहचान वाला प्रावधान हटाने की बात है, जिसके तहत कोई व्यक्ति बिना चिकित्सा जांच के अपने बताए हुए लिंग पहचान के आधार पर ट्रांसजेंडर पहचान प्रमाणपत्र प्राप्त कर सकता था। नई प्रक्रिया में जिला स्तरीय समिति द्वारा जांच अनिवार्य है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
NALSA निर्णय 2014 क्या था?
सर्वोच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण बनाम भारत संघ (2014) में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को तृतीय लिंग के रूप में मान्यता दी और लिंग स्व-पहचान के अधिकार को संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 के तहत मौलिक अधिकार घोषित किया।
ट्रांसजेंडर व्यक्ति अधिनियम 2019 में स्व-पहचान के बारे में क्या था?
2019 अधिनियम के तहत कोई भी व्यक्ति स्व-कथित लिंग पहचान के आधार पर ट्रांसजेंडर पहचान प्रमाणपत्र के लिए आवेदन कर सकता था — जिला मजिस्ट्रेट बिना चिकित्सा जांच के प्रमाणपत्र जारी करता था।
सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान और स्व-कथित लिंग पहचान में क्या अंतर है?
सामाजिक-सांस्कृतिक पहचानें (जैसे हिजड़ा, किन्नर) समुदाय-परिभाषित, ऐतिहासिक रूप से जड़ी पहचानें हैं। स्व-कथित लिंग पहचान व्यक्ति की अपनी आंतरिक भावना है — संशोधन पहली को मान्यता देता है लेकिन दूसरी को हटाता है।
संशोधन विधेयक 2026 के विरोध के क्या आधार हैं?
आलोचकों का तर्क है कि यह NALSA निर्णय का उल्लंघन करता है, अनिवार्य चिकित्सा जांच शारीरिक स्वायत्तता कम करती है, और योग्याकार्ता सिद्धांतों जैसे अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार मानदंडों के विरुद्ध है।
योग्याकार्ता सिद्धांत क्या हैं?
योग्याकार्ता सिद्धांत (2006, अद्यतन 2017) यौन अभिविन्यास और लिंग पहचान पर अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार कानून के अनुप्रयोग के सिद्धांत हैं, जिनका उपयोग ट्रांसजेंडर अधिकार बहसों में व्यापक रूप से होता है।