राजस्थान का पहला राज्य-स्तरीय घूमर महोत्सव जयपुर में शुरू हुआ और राज्य के सातों संभागीय मुख्यालयों में एक साथ इसका आयोजन किया गया। विवाह और त्योहारों जैसे शुभ अवसरों पर किया जाने वाला घूमर नृत्य आनंद, गरिमा और नारीत्व का प्रतीक है।

भील जनजाति ने देवी सरस्वती के सम्मान में इस नृत्य की शुरुआत की थी। बाद में राजपूत राजघरानों ने इसे नया रूप दिया। नृत्यांगनाएँ रंग-बिरंगे घाघरा-चोली और ओढ़नी पहनती हैं। घूमते हुए घाघरे की खास गति इस नृत्य की पहचान है। इस महोत्सव का उद्देश्य राजस्थान की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण और संवर्धन करना है। घूमर राज्य की सांस्कृतिक पहचान का एक प्रमुख हिस्सा है।