भारत 1 जनवरी 2026 से किम्बरली प्रक्रिया की अध्यक्षता ग्रहण करेगा। परीक्षा की दृष्टि से यह खबर केवल अंतरराष्ट्रीय व्यापार की नहीं, बल्कि राजस्थान की अर्थव्यवस्था से भी जुड़ी है, क्योंकि जयपुर का हीरा कटिंग और पॉलिशिंग उद्योग रत्न और आभूषण क्षेत्र का अहम हिस्सा है। किम्बरली प्रक्रिया प्रमाणन योजना का मुख्य उद्देश्य संघर्ष-हीरों को वैध अंतरराष्ट्रीय व्यापार से दूर रखना है। संघर्ष-हीरे वे कच्चे हीरे हैं जिनका इस्तेमाल विद्रोही समूह या उनके सहयोगी वैध सरकारों को कमजोर करने वाले संघर्षों को वित्तपोषित करने के लिए करते हैं।
किम्बरली प्रक्रिया एक त्रिपक्षीय पहल है, जिसमें सरकारें, अंतरराष्ट्रीय हीरा उद्योग और नागरिक समाज शामिल हैं। भारत 25 दिसंबर 2025 से उपाध्यक्षता संभालेगा और 2026 में अध्यक्ष रहेगा। यह तीसरी बार होगा जब भारत को किम्बरली प्रक्रिया की अध्यक्षता सौंपी जाएगी। किम्बरली प्रक्रिया प्रमाणन योजना 1 जनवरी 2003 से लागू है और इसमें 60 भागीदार हैं; यूरोपीय संघ और उसके सदस्य देशों को एक भागीदार माना जाता है। ये भागीदार मिलकर वैश्विक कच्चे हीरों के व्यापार का 99% से अधिक हिस्सा रखते हैं।
राजस्थान के लिए इसका महत्व जयपुर के हीरा कटिंग, पॉलिशिंग, रत्न और आभूषण कारोबार से आता है। प्रमाणन व्यवस्था मज़बूत होने पर वैध और संघर्ष-मुक्त हीरों पर उपभोक्ता भरोसा, व्यापार अनुपालन और पारदर्शिता जैसे मुद्दे प्रभावित होते हैं। प्रारंभिक परीक्षा में 1 जनवरी 2026 की अध्यक्षता, 25 दिसंबर 2025 की उपाध्यक्षता, 2003 में योजना का लागू होना, 60 भागीदार और 99% से अधिक कच्चे हीरा व्यापार जैसे तथ्य पूछे जा सकते हैं। मुख्य परीक्षा में इसे वैश्विक व्यापार शासन और स्थानीय उद्योगों पर अंतरराष्ट्रीय मानकों के प्रभाव के उदाहरण के रूप में लिखा जा सकता है।
