जनवरी 2026 में नीति आयोग-समर्थित टेरी रिपोर्ट ने भारत के ई-कचरा क्षेत्र में छिपे आर्थिक अवसर को सामने रखा। रिपोर्ट के अनुसार भारत के ई-कचरे का वार्षिक आर्थिक मूल्य लगभग ₹51,000 करोड़ है। इसमें से करीब 60% मूल्य तकनीकी रूप से निकाला जा सकता है, लेकिन मौजूदा रिकवरी व्यवस्था इस क्षमता का केवल 18% ही हासिल कर पा रही है। इसी आधार पर लगभग ₹30,600 करोड़ का मूल्य तकनीकी रूप से रिकवर किया जा सकता है, पर संग्रह, छंटाई, औपचारिक रीसाइक्लिंग और अनुपालन की कमज़ोरियों के कारण बड़ा हिस्सा उपयोग में नहीं आ पाता।
परीक्षा की दृष्टि से यह खबर अर्थव्यवस्था, पर्यावरण और शासन के साझा विषय से जुड़ती है। ई-कचरा केवल प्रदूषण का मुद्दा नहीं है; यह संसाधन-कुशल विकास, चक्रीय अर्थव्यवस्था, माल-ढुलाई और शहरी अपशिष्ट प्रबंधन से भी जुड़ा है। नीति आयोग ने 22 जनवरी 2026 को जयपुर में उपयोग अवधि पूरी कर चुके वाहनों, बेकार टायरों तथा ई-कचरे और लिथियम-आयन बैटरियों पर तीन चक्रीय अर्थव्यवस्था रिपोर्ट जारी कीं। सरकारी सूचना के अनुसार ई-कचरा 2024 के 61.9 लाख मीट्रिक टन से बढ़कर 2030 तक 1.4 करोड़ मीट्रिक टन हो सकता है। इससे साफ है कि आने वाले वर्षों में संग्रह नेटवर्क, औपचारिक रीसाइक्लिंग क्षमता और विस्तारित उत्पादक दायित्व का महत्व और बढ़ेगा।
RAS और UPSC जैसी परीक्षाओं में यह विषय प्रीलिम्स में तथ्यात्मक आंकड़ों, रिपोर्ट-आधारित प्रश्नों और पर्यावरण-अर्थव्यवस्था के स्टैटिक जीके लिंक के रूप में पूछा जा सकता है। मुख्य परीक्षा में इससे सतत विकास, संसाधन सुरक्षा, शहरी शासन, औपचारिक-अनौपचारिक क्षेत्र की भूमिका और नीति क्रियान्वयन पर छोटे नोट या विश्लेषणात्मक उत्तर बन सकते हैं। मुख्य निष्कर्ष यह है कि भारत के पास ई-कचरे से बड़ा आर्थिक मूल्य निकालने की क्षमता है, लेकिन रिकवरी दर बढ़े बिना यह अवसर चक्रीय अर्थव्यवस्था में पूरी तरह नहीं बदलेगा।
